171. वहशते-दिल को मिटाने के लिए आया हूँ
वहशते-दिल को मिटाने के लिए आया हूँ
ज़ख़्म सीने के छिपाने के लिए आया हूँ
क़ैदे-तन्हाई में हासिल नहीं होगा कुछ भी
छोड़ दो मुझको ज़माने के लिए आया हूँ
मेरी बर्बाद मुहब्बत पे हँसो, ख़ूब हँसो
दोस्तो! हाल सुनाने के लिए आया हूँ
आईना आईना है, आईनाख़ाने से अलग
आईना उनका दिखाने के लिए आया हूँ
मैं नहीं जानता किस वास्ते ऐ जाने-वफ़ा
सर तेरे दर पे झुकाने के लिए आया हूँ
दूर ले जाओ कहीं नाव यहाँ से "माँझी"
आग पानी में लगाने के लिए आया हूँ
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. वहशते-दिल=दिल का पागलपन, 2. क़ैदे-तन्हाई =एकान्तवास की जेल।
("क्यों सभी ख़ामोश हैं" से)
No comments:
Post a Comment