142. कोई अपना ही छल गया देखो
कोई अपना ही छल गया देखो
चढ़ता सूरज भी ढल गया देखो
एक पियादे से पिट गया राजा
कौन-सी चाल चल गया देखो
चीख़ सुनकर अँधेरी रातों में
कोई घर से निकल गया देखो
सर्द रातों में क्या हुआ उसको
दिल के शोलों से जल गया देखो
चलती कश्ती में बहते पानी में
कैसे "माँझी" बदल गया देखो
-देवेन्द्र माँझी
("समन्दर के दायरे" से)
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