Thursday, December 31, 2015

282.  इस शहर में शोर-सा है चुप रहो 


इस शहर में शोर-सा है चुप रहो
फिर कोई मुद्दा उठा है चुप रहो

सबके सब बीमार आते हैं नज़र
किसपे किसकी बद्दुआ है चुप रहो

रौशनी में माँगकर लाया नहीं
मेरा अपना घर जला है चुप रहो

उड़ रहे हैं आज सब आकाश में
कौन धरती से जुड़ा है है चुप रहो

लाख 'माँझी' ने चलाई कश्तियाँ
कब मगर सागर मथा है चुप रहो
                          -देवेन्द्र माँझी

('मजबूरियाँ मेरी' से)


Is shahar me'n shor saa hai chup raho

Phir koi muddaa uTHaa hai chup raho

Sab ke sab beemaar aate hai'n nazar
Kis pe kis ki bad.duaa hai chup raho

Raushani mai'n maa'ng kar laayaa nahi'n
Mera apnaa ghar jalaa hai chup raho

URR rahe hai'n aaj sab aakaash me'n
Kaun dhartee se juRRaa hai chup raho

Laakh 'Manjhi' ne chalaaii kashtiyaa'n
Kab magar saagar mathaa hai chup raho

-Devender Manjhi

Wednesday, December 30, 2015

281. नया साल मुबारक हो 



नया साल मुबारक हो
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कोरे काग़ज़ को लिये बैठा हूँ तन्हाई में
क़ैद करने को सितारों से तेरी चाल अबके
मुस्तहक़्क़ तू ही नहीं फ़ैज़-ओ-करम का 'माँझी'
दोस्तों को भी मुबारक हो नया साल अबके
                                  -देवेन्द्र माँझी

Nayaa Saal Mubarak Ho
_________________

Kore kaaghaz ko liye baithaa hu'n tanhaai me'n
Qaid karne ko sitaaro'n se teri chaal ab ke
Mustahaqq tuu hi nahi'n faiz-o-karam ka 'Manjhi'
Dosto'n ko bhi mubarak ho nayaa saal ab ke

-Devender Manjhi

Tuesday, December 29, 2015

281. चाँदनी होते हुए शम्अ़ जला दी तूने 


चाँदनी होते हुए शम्अ़ जला दी तूने
जाने क्या सोचके शोलों को हवा दी तूने

वो कोई और है इस शहर का रहनेवाला
अजनबी शख़्स न था जिसको सदा दी तूने

बर्गे-आवारा बना फिरता हूँ सहरा-सहरा
चमन-ए-ज़ीस्त को पतझड़ की सज़ा दी तूने

साये में जिसके बहुत ख़्वाब सुहाने देखे
आज दीवार वो ठोकर से गिरा दी तूने

शुक्रिया कैसे हो 'माँझी' से अदा मौजे-बला
नाव तूफ़ान से साहिल पे लगा दी तूने
                                -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. शम्अ़=दीपक, 2. सदा=आवाज़, 3. बर्गे-आवारा=शाख से टूटा हुआ पत्ता, 4. सहरा-सहरा=रेगिस्तानों में, जंगलों में, 5. चमन-ए-ज़ीस्त=जीवन-बगिया, ज़िन्दगी का उपवन, 6. मौजे-बला=आपत्तिओं की लहरों के थपेड़े, 7. साहिल=तट, किनारा।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Chaa'ndanee hote hue sham'a jalaa dee tuu ne... 
Jaane kyaa soch ke sholo'n ko hawaa dee tuu ne...

Vo koi aur hai is shahar ka rahne waala... 
Ajnabee shaKHs na tha jisko sadaa dee tuu ne... 

Barg-e-aawaara banaa phirtaa hu'n sahraa-sahraa... 
Chaman-e-zeest ko patjhaRR ki sazaa dee tuu ne... 

Saaye mein jiske bahut KHwaab suhaane dekhe... 
Aaj deewaar vo THokar se giraa dee tuu ne... 

Shukriya kaise ho 'Manjhi' se adaa mauj-e-balaa... 
Naav toofaan se saahil pe lagaa dee tuu ne... 
                                                     -Devender Manjhi

Wednesday, December 23, 2015

280. वो जो मुझसे शराब माँगे है 


वो जो मुझसे शराब माँगे है
जाने क्यों बेहिसाब माँगे है

उसकी ज़िद भी अजीब है कितनी
मेरी आँखों के ख़्वाब माँगे है

वक़्त ज़ालिम है कैसे चुपके से
मुझसे मेरा शबाब माँगे है

बारहा सोचकर वो जाने क्या
आईनों से नक़ाब माँगे है

कैसी बिगड़ी है अक़्ल 'माँझी' की
प्यार मुझसे नवाब माँगे है
                      -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. शबाब=जवानी, 2. बारहा=बार-बार, 3. नक़ाब=पर्दा।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Vo jo mujh se sharaab maa'nge hai 
Jaane kyo'n be.hisaab maa'nge hai 

Uski zid bhi ajeeb hai kitnee 
Meri aa'nkho'n ke KHwaab maa'nge hai 

Waqt zaalim hai kaise chupke se 
Mujh se mera shabaab maa'nge hai 

Baar.haa sochkar vo jaane kyaa 
Aa.iino'n se naqaab maa'nge hai 

Kaisi big.Dee hai aql 'Manjhi' ki 
Pyaar mujh se nawaab maa'nge hai 
                            -Devender Manjhi 
1. Shabaab = Jawaani 
2. Baar.haa = Baar-baar 
3. Naqaab = Pardaa 

( "majbooriyaa'n meri" se)

Tuesday, December 22, 2015

279.  ख़ुद अपने आपसे उरियाँ-बदन लिपट जा तू 


ख़ुद अपने आपसे उरियाँ बदन लिपट जा तू
बिखरने वाले कुछ इस तरह सिमट जा तू

छुपे हैं ऐब गली में तुझे नहीं मालूम
भला इसी में है इस मोड़ से पलट जा तू

उसी के आने पर क्या फ़र्शे-राह बनना है
अभी से धूल-भरी आँधियों में अट जा तू

निशाँ भी मिल नहीं पाएँगे पायेँगे मेरे क़दमों के
कभी न करना तआक़ुब मेरा पलट जा तू

झुलस ही जाएगा सारा बदन तेरा 'माँझी'
ये जलती आग का दरिया है दूर हट जा तू
                                     -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. उरियाँ-बदन=नंगे बदन, 2. फ़र्शे-राह=रास्ते का फ़र्श अर्थात् क़ालीन, 3. तआक़ुब=पीछा करना।

(मजबूरियाँ मेरी' से)


KHud apne aap se uryaa'n badan lipaT jaa tuu...
Bikharne waale kuchh is tarah simaT jaa tuu...

Chhupe hai'n ai'b galee me'n tujhe nahi'n maaluum...
Bhalaa isi me'n hai is moRR se palaT jaa tuu...


Usii ke aane par kya farsh-e-raah ban.naa hai...
Abhi se dhool-bharii aandhiyo'n me'n aT jaa tuu...

Nishaa'n bhi mil nahi'n paa.e'nge mere qadmo'n ke...
Kabhi na karnaa ta'aaqub mera, palaT jaa tuu...

Jhulas hi jaa.egaa saara badan tera 'Manjhi'...
Ye jaltee aag ka dariyaa hai, duur haT jaa tuu...

                                       -Devender Manjhi
 

. Uryaa'n- badan = Na'nge badan
2. Farsh-e-raah = raaste ka farsh, arthaat (matlab) = Qaaleen
3. Ta'aaqub = peechhaa karnaa
 

Monday, December 21, 2015

278.  किसलिए वृक्षो! सलाम पतझड़ में 


किसलिए वृक्षो! सलाम पतझड़ में
कर गए पत्ते तमाम पतझड़ में

धूप आकर बारहा इस छाँव से
ले रही है इन्तिक़ाम पतझड़ में

आँधियाँ हैं, गर्द ही तो लाएँगी
रात हो या सुबहो-शाम पतझड़ में

आईनों की क़द्र घटती ही गई
आ गया कैसा मुकाम पतझड़ में

ज़िन्दगी की नाव 'माँझी' किसलिए
कर चला लहरों के नाम पतझड़ में
                                 -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

277.  लग जाते गर वाज़िब दाम 


लग जाते गर वाज़िब दाम
कर देता ख़ुद को नीलाम

यार, तुम्हारा हक़ है ये
ख़ूब करो मुझको बदनाम

मैं हूँ रोटी का भूखा
कैसी इज़्ज़त, कैसा नाम

माज़ी के औराक़ न खोल
करने दे मुझको आराम

फिर भी मैं आग़ाज़ करूँ
वाक़िफ़ हूँ क्या है अंजाम

आए न इस आँगन में फिर
दर्द  की मारी ऐसी शाम

मस्त हवा का झोंका भी
आता है पतझड़ के काम

'माँझी' हूँ मैं बीच भँवर
लहरों पर लिक्खूँगा नाम
                  -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. माज़ी=भूतकाल, 2. औराक़=पृष्ठ, पन्ने, 3. आग़ाज़=शुरूआत।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Lag jaate gar waazib daam 
Kar deta KHud ko neelaam 

Yaar, tumhaara haq hai ye 
KHoob karo mujh ko badnaam 

Mai'n huu'n roTii ka bhookhaa 
Kaisii izzat, kaisaa naam 

Maazii ke auraaq na khol 
Karne de mujh ko aaraam 

Phir bhi mai'n aaghaaz karuu'n 
Waaqif huu'n kyaa hai anjaam 

Aa.e na is aa'ngan me'n phir 
Dard ki maari aisi shaam 

Mast hawaa ka jho'nkaa bhi 
Aataa hai pat.jhaRR ke kaam  

'Manjhi' huu'n mai'n beech bha'nwar 
Lahro'n par likkhuu'ngaa naam 
                         -Devender Manjhi 
Maazii = bhoot.kaal 
Auraaq = prishTH, panne 
Aaghaaz = shuru.aat 
( 'majbooriya'n meri' se )

Friday, December 18, 2015

276. पंछी कितनी धूम मचा लें, झूमें बेशक नदिया-ताल 


पंछी कितनी धूम मचा लें, झूमें बेशक नदिया-ताल
चढ़ते सूरज की मस्ती का साँझ ढले पूछेंगे हाल

नव-आगन्तुक के स्वागत में दीप बनो या बनो मशाल
मुझसे भी बदतर आएगा कहता है ये जाता साल

माथे पर बल ले आते हैं हरदम खींचें मेरी खाल
रोज़ उठा देता है दरपन ऐसे-वैसे लाख सवाल

जिन सपनों को आँखों में ले नाच रहा है देकर ताल
देख कहीं वो कपटी बनकर कर ना दें आदर्श हलाल

 हाथ धरे हाथों पर अपने, करना छोड़ो यार मलाल
मछली तो फँस ही जाएगी 'माँझी' फेंको तुम भी जाल
                                                   -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Panchhi kitnee dhoom machaa le'n, jhoome'n beshak nadiaa-taal...
ChaRRte sooraj ki masti ka saanjh Dhale puuchhe'nge haal...

Nav-aagantuk ke swaagat mein deep bano ya bano mashaal...
Mujh se bhi badtar aaegaa kahtaa hai ye jaata saal...

Maathe par bal le aate hai'n hardam khee'nche'n meri khaal...
Roz uTHaa deta hai darpan aise-vaise laakh sawaal...

Jin sapno'n ko aankho'n me'n le naach rahaa hai dekar taal...
Dekh kahi'n wo kap.Tee bankar kar na de'n aadarsh halaal...

Haath dhare haatho'n par apne, karnaa chhoRRo yaar malaal...
Machhlee tou pha'ns hi jaaegii 'Manjhi' phe'nko tum bhi jaal...

-Devender Manjhi

( 'majbooriya'n meri se)

Thursday, December 17, 2015

275. खेलेगा कुछ खेल यहाँ वो 


खेलेगा कुछ खेल यहाँ वो
करता है नित मेल यहाँ वो

उससे पूछो क्यों आया है
बेचेगा क्या तेल यहाँ वो

देख रहा है हर पंछी को
थामे एक गुलेल यहाँ वो

ग़ैरत और ईमान बिकेंगे
आज लगी है 'सेल' यहाँ वो

'माँझी' लहरें वश में हों जो
लेकर आओ नकेल यहाँ वो
                           -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. सेल=बिक्री।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Khelegaa kuchh khel yahaa'n wo 
Kartaa hai nit mel yahaa'n wo 

Us se puuchho kyo'n aaya hai 
Bechegaa kyaa tel yahaa'n wo 

Dekh rahaa hai har panchhee ko 
Thaame ek gulel yahaa'n wo 

Ghairat aur iimaan bike'nge 
Aaj lagee hai 'SALE' yahaa'n wo 

'Manjhi' lahre'n vash me'n ho'n jo 
Lekar aa.o nakel yahaa'n wo 
                -Devender Manjhi 
SALE = bikri 

( 'majbuuriyaa'n meri' se)

Wednesday, December 16, 2015

274.  ठोस धरती पर रहो या बन हवा बह लीजिए 


ठोस धरती पर रहो या बन हवा बह लीजिए
आपकी मर्ज़ी है चाहे जैसे भी रह लीजिए

पड़ गई है मुझको आदत बात सुनने की बहुत
आपके मन में जो आए आप भी कह लीजिए

इस पतन का दोष सारा मेरे माथे पर मढ़ो
और फिर हँसकर कहो--'मेरे लिए सह लीजिये'

कुछ नहीं रक्खा है दुनिया के झमेलों में नदीम
है यही अच्छा कि अपने-आपमें रह लीजिये

मार दुनिया कि सही 'माँझी' यूँ तुमने रात-दिन
ये थपेड़े लहर के हैं इनको भी सह लीजिये  
                                         -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. नदीम =दोस्त, मित्र।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

THos dharti par raho ya ban havaa bah leejiye... 
Aapki marzi hai chaahe jaise bhi rah leejiye... 

PaR gayii hai mujhko aadat baat sun.ne ki bahut. .. 
Aap ke man me'n jo aaye aap bhi kah leejiye... 

 Is patan ka dosh saara mere maathe par maRHo. .. 
Aur phir hanskar kaho- 'mere liye sah leejiye' ... 

Kuchh nahi'n rakkhaa hai duniya ke jhamelo'n mein nadeem... 
Ye thapeRe lahar ke hai'n inko bhi sah leejiye... 
                                                 -Devender Manjhi 
 Nadeem = Dost, Mitra 
Patan = neeche girnaa

Tuesday, December 15, 2015

273.  गुम हुआ है क़हक़हा फुटपाथ पर 


गुम हुआ है क़हक़हा फुटपाथ पर
पढ़ रहा हूँ मर्सिया फुटपाथ पर

पूछते हैं सब ये किसका पाप है
देखकर बच्चा पड़ा फुटपाथ पर

दिन में तू सारा जहाँ अपना समझ
रात में बिस्तर लगा फुटपाथ पर

मैंने पूछा ज़िन्दगी तू है कहाँ
चीख़कर उसने कहा--'फुटपाथ पर'

आज 'माँझी' सागरों को क्या हुआ
नाव जो तू ला रहा फुटपाथ पर
                          -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Monday, December 14, 2015

272.  देखके मुझसे मेरी जंग 


देखके मुझसे मेरी जंग
दुश्मन भी रह जाते दंग

छीन लिया है मेरा चैन
और करो ना मुझको तंग

जीने को सब जीते हैं
चिड़िया, कौवा, कीट, पतंग

गिरगिट भी तौबा करते
मानव बदले इतने रंग

तूफ़ानों की फ़िक्र नहीं
'मांझी' रहता मस्त-मलंग
                    -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Sunday, December 13, 2015

271. जैसे ख़ुशबू उपवन में 


जैसे ख़ुशबू उपवन में
आ जा तू आलिंगन में

दिल की आग भड़कती है
जाने क्यों इस सावन में

देख हमें क्यों मस्त यहाँ
ये दुनिया है उलझन में

दहशत ही बस दहशत है
क्यों देखूँ इस दरपन में

सात समन्दर ठहरे हैं
'माँझी' दिल के आँगन में
                   -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Friday, December 11, 2015

270.  गली-गली में हवाएँ हैं नौहा-ख्वाँ शायद 


गली-गली में हवाएँ हैं नौहा-ख्वाँ शायद
हुआ है क़त्ल मेरे पाँव का निशाँ शायद

इस अंजुमन में वो आँखें चुराके चुप-सा गया
हुआ है सबसे ही वो शख़्स बदगुमाँ शायद

घुटे-घुटे से चिराग़ों से उठ रहा है धुआँ
सुनेंगे आज वो मेरी भी दास्ताँ शायद

गला दबाने को सारा ही शहर टूट पड़ा
ज़बान माँग रहा है वो बेज़बाँ शायद

दिखाई देती नहीं है ज़मीन पैरों तले
सरक के आ गया इस साल आस्माँ शायद

छलाँग मार नदी में तू बेख़तर 'माँझी'
भँवर की ओर बढ़ी हैं ये कश्तियाँ शायद
                               -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. नौहा-ख्वाँ=मातमी, 2. बेख़तर=निडर होकर।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Gali-gali me'n hawaa.e'n hai'n nauhaa-Khwaa'n shaayad...
Hu.aa hai qatl mere paa'NV ka nishaa'n shaayad...

Is anjuman me'n vo aa'nkhe'n churaa ke chup-sa gayaa...
Hu.aa hai sabse hi vo shaKHs badgumaa'n shaayad...

Ghute-Ghute se chiraagho'n se uTH rahaa hai dhu.aa'n...
Sune'nge aaj vo meri bhi daastaa'n shaayad...

Galaa dabaane ko saara hi shahar TuuT paDaa...
Zabaan maa'ng rahaa hai vo bezabaa'n shaayad...

Dikhaa.ii deti nahi'n hai zameen pairo'n tale...
Sarak ke aa gayaa is saal aasmaa'n shaayad...

Chhalaa'ng maar nadi me'n tuu beKHatar 'Manjhi'...
Bha'nwar ki or baDHee hai'n ye kashtiyaa'n shaayad...

-Devender Manjhi

NauhaaKHwaa'n = maatam karne waala
BeKHatar = niDar hokar

("Majbooriyaa'n meri" se)

Thursday, December 10, 2015

269.  अंधी रातों के दरम्याँ कैसे 


अंधी रातों के दरम्याँ कैसे
डूब जाती हैं सिसकियाँ कैसे

ला के इस आरज़ू के साहिल पर
तोड़ दीं तूने सीपियाँ कैसे

याद जब कोई करनेवाला नहीं
आ रही हैं ये हिचकियाँ कैसे

लिखके अश्कों की रौशनाई से
उसने भेजी हैं अर्ज़ियाँ कैसे

तीरगी में नहा रहे हैं लोग
शहर की गुल हैं बत्तियाँ कैसे

चलके देखें हुज़ूर में उनके
मुआफ़ होती हैं ग़लतियाँ कैसे

तेरी कश्ती से झील में 'माँझी'
वो पकड़ते हैं मछलियाँ कैसे
                         -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Andhi raato'n ke darmiyaa'n kaise... 
Doob jaati hai'n siskiyaa'n kaise... 

Laa ke is Aarzuu ke saahil par... 
ToD dee'n tuu_ne seepiyaa'n kaise... 

Yaad jab koi karne.waala nahi'n... 
Aa rahi hai'n ye hichkiyaa'n kaise... 

Likh ke ashko'n ki raushanaaii se... 
Usne bhejii hai'n arziyaa'n kaise... 

Teergii mein nahaa rahe hai'n log... 
Shahar kii gul hai'n battiyaa'n kaise... 

Chal ke dekhe'n huzuur me'n unke... 
Muaaf hoti hai'n ghaltiyaa'n kaise... 

Teri kashtee se jheel mein 'Manjhi'... 
Vo pakaD.te hai'n machhliyaa'n kaise... 
                           -Devender Manjhi 
( "majbooriyaa'n meri" se)

Wednesday, December 9, 2015


268.  राज़ जब सच्चाई का सब खुल गया 


राज़ जब सच्चाई का सब खुल गया
क्यों नगर ये हो बहुत व्याकुल गया

पत्थरों को देखकर भी हाथ में
आईना दिखलाने पर वो तुल गया

तितलिओं की बात जब उसने सुनी
बोझ-सा मन पर लिये इक गुल गया

जब बनीं तो बन गईं पुश्तें कई
जब गया तो सारे कुल का कुल गया

देख 'माँझी' आज दामन ख़ुद-ब-ख़ुद
आँख से अश्कों को लेकर धुल गया
                                 -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. गुल=फूल, पुष्प, २. अश्क=आँसू।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Tuesday, December 8, 2015

267.  जो शख़्स तीर की मानिन्द उतर गया मुझमें 


जो शख़्स तीर की मानिन्द उतर गया मुझमें
पुरानी रंजिशों का ज़हर भर गया मुझमें

तलाश करता रहा उसको शाह-राहों पर
ख़बर न थी कि वो घुट-घुटके मर गया मुझमें

चला गया कोई चुपके से शम्अ़ दिखलाकर
लगा कुछ ऐसा ज़माना गुज़र गया मुझमें

जमूद तोड़ के ख़्वाबों का कैसे आख़िरे-शब
वो एक झोंका हवा का बिख़र गया मुझमें

ये रोज़-रोज़ का ख़तरा भी टल गया 'माँझी'
बला-ए-जाँ था जो तूफ़ाँ ठहर गया मुझमें
                                        -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. मानिन्द=की तरह, 2. शाह-राह=चिकनी-चौड़ी सड़कें, हाइवे, 3. आख़िरे-शब=रात्रि का अन्तिम पहर, 4. बला-ए-जाँ=जान के लिए आफ़त।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Jo shaKHs teer ki maanind utar gayaa mujh.me'n...
Puraani ranjisho'n ka zahar bhar gayaa mujh.me'n...

Talaash kartaa rahaa usko shaah-raaho'n par...
KHabar na thi ki vo ghuT-ghuT ke mar gayaa mujh.me'n...

Chalaa gayaa koi chupke se sham'a dikhlaakar...
Lagaa kuchh aisaa zamaana guzar gayaa mujh.me'n

Jamood toD ke KHwaabo'n ka kaise aaKHir-e-shab...
Vo ek jho'nkaa havaa ka bikhar gayaa mujh.me'n...

Ye roz-roz ka KHatraa bhi Tal gayaa 'Manjhi'...
Balaa-e-jaa'n tha jo tuufaa'n THahar gayaa mujh.me'n...

                                                     -Devender Manjhi

Maanind = kee tarah

Shaah-raah = Chiknee-chauDee saDke'n, "Highway"
 


Aakhir-e-shab = Raatri ka antim prahar

Balaa-e-jaa'n = Jaan ke liye aafat
 

Monday, December 7, 2015

266.  किस क़दर दिल-फ़िगार है माँझी 


किस क़दर दिल-फ़िगार है माँझी
दर्द  बे-इख़्तियार  है  माँझी

मुझको शोला-फ़िशाँ है और उनको
ये फ़िज़ा मुश्कबार है माँझी

उनसे जाकर ये कोई तो कह दे
रात-दिन बे-क़रार है माँझी

वो नहीं हैं तो एक तू  ही नहीं
शहर ये सोगवार है माँझी

अपने  वादे को वो भुला बैठे
शाम से जिनका इन्तिज़ार है माँझी

उजड़ा-उजड़ा है सारा रंगे-चमन
कैसी फ़स्ले-बहार है माँझी

बेगुनाहों के ख़ून से अफ़सोस
ये ज़मीं दाग़दार है माँझी

जिसको अपना भी एतिबार नहीं
कितना बे-एतिबार है माँझी
                         -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. दिल-फ़िगार=घायल दिलवाला, 2. शोला-फ़िशाँ=अंगारे बरसानेवाली, 3. मुश्कबार=सुगन्ध फैलानेवाली, 4. फ़स्ले-बहार=बसन्त का मौसम, फूलों का मौसम।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Kis qadar dil-figaar hai Manjhi 
Dard be-iKHtiyaar hai Manjhi 

Mujhko sholaa-fishaa'n hai aur unko 
Ye fizaa mushk.baar hai Manjhi 

Unse jaakar ye koi tou kah de 
Raat-din be-qaraar hai Manjhi 

Vo nahi'n hai'n tou ek tuu hi nahi'n 
Shahar ye sogavaar hai Manjhi 

Apne waade ko vo bhulaa baiThe 
Shaam se jinkaa intizaar hai Manjhi 

UjDaa-UjDaa hai saara rang-e-chaman 
Kaisi fasl-e-bahaar hai Manjhi 

Begunaaho'n ke KHoon se afsos 
Ye zamee'n daaghdaar hai Manjhi 

Jisko apna bhi aitibaar nahi'n 
Kitna be-aitibaar hai Manjhi 
                     -Devender Manjhi 
Dil-figaar = Ghaayal dil waala 
Sholaa-fishaa'n = a'ngaare barsaane waali 
Mushk.baar = Sugandh (khushbuu) phailaane waali 
Fasl-e-bahaar = basant/ phoolo'n ka mausam
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Sunday, December 6, 2015

265.  तुम न देते अगर सज़ा मुझको 


तुम न देते अगर सज़ा मुझको
उम्र-भर रहता ये गिला मुझको

सबकी नज़रें सवालिया होंगी
यूँ न धीरे से तू बुला मुझको

क्या बताती हैं ये लक़ीरें अब
मुट्ठियाँ खोलकर दिखा मुझको

सुबह का टिमटिमाता वो तारा
देने आया है हौसला मुझको

मुझको जाना नहीं है मंज़िल पर
क्यों बुलाता है रास्ता मुझको

मैं सितमगर, फ़रेबी, झूठा हूँ
उसने क्या-क्या न यूँ कहा मुझको

आज तूफ़ान बनके जाने दो
कोई 'माँझी' बुला रहा मुझको
                          -देवेन्द्र माँझी
(मजबूरियाँ मेरी' से)

Tum na dete agar sazaa mujhko
Umr bhar rahtaa ye gilaa mujhko

Sabkee nazare'n sawaaliyaa ho'ngee
Yu'n na dheere se tuu bulaa mujhko

Kyaa bataatee hai'n ye laqeere'n ab
Mutthiyaa'n khol kar dikha mujhko

Subah ka TimTimaata vo taara
Dene aaya hai hausalaa mujhko

Mujhko jaana nahi'n hai manzil par
Kyo'n bulaata hai raasta mujhko

Mai'n sitamgar, farebi, jhooTHaa hu'n
Usne kyaa-kyaa na yuu'n kahaa mujhko

Aaj toofaan ban ke jaane do
Koi 'Manjhi' bulaa rahaa mujhko

-Devender Manjhi

Thursday, December 3, 2015

264. मकड़िओं के ये जाल फ़ुर्सत में 


मकड़िओं के ये जाल फ़ुर्सत में
कर रहे हैं निढाल फ़ुर्सत में

जाने क्यों पूछते हैं मुझसे सब
ऐसे-वैसे सवाल फ़ुर्सत में

लोग जी भरके देख लें तुझको
ख़ुद को घर से निकाल फ़ुर्सत में

लूट ले मुझको मेरे साये तू
वरना होगा मलाल फ़ुर्सत में

 जिनके होंठों पे मुस्कराहट है
पूछिए उनका हाल फ़ुर्सत में

फिर किसी को सम्हालना 'माँझी'
पहले ख़ुद को सम्हाल फ़ुर्सत में

घाट पर बैठकर तू ऐ 'माँझी'
यूँ न पानी उछाल फ़ुर्सत में
                      -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Sunday, November 29, 2015

263. हम जब शीशा लेकर आये 


हम जब शीशा लेकर आये
हर जानिब से पत्थर आये

जब भी आये पीठ पे मेरी
अपनों के ही ख़ंज़र आये

फूँक गईं प्रगति की लपटें
राह में जितने छप्पर आये

कोई करे, भोगे है कोई
सब इल्ज़ाम मेरे सर आये

जिसको जाना पार नदी के
वो 'माँझी' को लेकर आये
                     -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. जानिब=पक्ष, पहलू, तरफ़, ओर, 2. इल्ज़ाम=आरोप।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Ham hab sheeshaa lekar aaye 
Har jaanib se patthar aaye 

Jab bhi aaye peeTH pe meri 
Apno'n ke hi khanjar aaye 

Phoo'nk gayii'n pragati ki lapte'n 
Raah me'n jitne chhappar aaye 

Koi kare, bhoge hai koi 
Sab ilzaam mere sar aaye 

Jisko jaana paar nadee ke 
Vo 'Manjhi' ko lekar aaye 
-Devender Manjhi 
Pragati = taraqqee

262. अपनी मस्ती में लीन हैं गलियाँ 


अपनी मस्ती में लीन हैं गलियाँ
कितनी दिलकश-हसीन हैं गलियाँ

शाम होते ही ओढ़ ली रौनक़
कितनी पर्दा-नशीन हैं गलियाँ

मस्त नागिन बनीं सभी सड़कें
किस सपेरे की बीन हैं गलियाँ

राह हमको दिखाएँ मंज़िल की
हर मकाँ की मकीन हैं गलियाँ

लाख 'मांझी' कहे ज़माना कुछ
मेरा अपना यक़ीन हैं गलियाँ
                              -देवेन्द्र मांझी

शब्दार्थ--1. मकीन=मकान में रहनेवाली।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Apni masti me'n leen hai'n galiyaa'n 
Kitni dilkash-haseen hai'n galiyaa'n 

Shaam hote hi oRRh lee raunaq 
Kitni pardaa-nasheen hai'n galiyaa'n 

Mast naagin banee'n sabhi saRke'n 
Kis sapere ki been hai'n galiyaa'n 

Raah ham ko dikhaaye'n manzil ki 
Har makaa'n ki makeen hai'n galiyaa'n 

Laakh 'Manjhi' kahe zamaana kuchh 
Mera apnaa yaqeen hai'n galiyaa'n 
                              -Devender Manjhi 
 Makeen = makaan me'n rahne waali

Thursday, November 26, 2015

261. करता है तू प्यार की बात 


करता है तू प्यार की बात
फूँस का घर अंगार की बात

बिन फूलों के छेड़ूँ क्या
गुलशन से मैं ख़ार की बात

जीत से ज़्यादा याद रही
मुझको मेरी हार की बात

सिर्फ़ हवा  में बनते घर
छोड़ी है आधार की बात

सागर टाल न पाता है
'माँझी'-ओ-पतवार की बात
                         -देवेन्द्र माँझी

karta hai tu pyaar ki baat 
phooNs ka ghar, angaar ki baat  

bin phooloN ke chhedooN kya 
gulshan se maiN khaar ki baat 

jeet se zyaada yaad rahi 
mujhko meri haar ki baat 

sirf hawa meiN bantey ghar 
chhodee hai aadhaar ki baat 

saagar Taal na paata hai 
'Maanjhi' -o-patwaar ki baat

260. साज़ गया, संगीत गया 


साज़ गया, संगीत गया
मौसम हमसे जीत गया

मन का पंछी चौंच में ये
भरकर कैसी प्रीत गया

उससे हारी ये दुनिया 
ख़ुद से जो भी जीत गया

देख मुहब्बत का मंज़र
क्यों मन हो भयभीत गया

आज बताओ 'माँझी' क्यों
सारा सागर रीत गया
                    -देवेन्द्र माँझी

Wednesday, November 25, 2015

259. जी लिया कुछ दिन अगर इस धर्म-ओ-ईमान में 


जी लिया कुछ दिन अगर इस धर्म-ओ-ईमान में
तो क़सीदों का कफ़न मिल जाएगा सम्मान में

फेर लेंगे ये नज़र सब वक़्त जब भी आएगा
मत समय बर्बाद कर तू जान-ओ-पहचान में

सोचकर अच्छी तरह से अब बता दे तू स्वयं
जिस्म दिखता है कि ढँकता है तेरे परिधान में

फ़िक्र बच्चों की नहीं थी, होश अपना भी न था
जी रहा था आज-तक मैं एक झूठी शान में

सोच  ले 'माँझी' करेगा कैसे दरिया पार तू
बात पहली-सी नहीं है आज के तूफ़ान में
                                      -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. क़सीदों का कफ़न=मरने के बाद होनेवाली पद्यात्मक प्रशंसा। 

Jee liya kuchh din agar is dharm-o-iimaan mein...
Tou qaseedo'n ka kafan mil jaaegaa sammaan mein...

Pher le'nge ye nazar sab waqt jab bhi aaegaa...
Mat samay barbaad kar tuu jaan-o-pahchaan mein...

Sochkar achchhee tarah se ab bataa de tuu swayam...
Jism dikhtaa hai ki dha'nktaa hai tere paridhaan mein...

Fikr bachcho'n ki nahi'n thi, hosh apna bhi na thaa...
Jee rahaa thaa aaj tak mai'n ek jhooTHee shaan mein...

Soch le 'Manjhi' karegaa kaise dariyaa paar tuu...
Baat pahlee see nahi'n hai aaj ke tuufaan mein...

-Devender Manjhi

Qaseedo'n ka kafan = Marne ke baad hone waali padyaatmak (nazmo'n mein) prashansaa (tehseen, taareef)

Paridhaan = Libaas, Dress

Tuesday, November 24, 2015

258. देखी को अनदेखी कर, क्या बाहर क्या भीतर है 


देखी को अनदेखी कर, क्या बाहर क्या भीतर है
मन को पीड़ा क्यों देता है ये क़िस्सा तो घर-घर है

फिर क्यों ना विश्वास करें हम पथरीली इस दुनिया का
जान गए हैं जब इतना सच शीशा भी इक पत्थर है

बात तो कोई होगी ही जो थाम के ग़ज़लों का दामन
आग लगाने आता है जो बढ़-चढ़ हर इक अक्षर है

देख के मुझको सब पूछेंगे इतना तो ये दावा है
वो जो गुज़रे राहगुज़र से आख़िर किसका लश्कर है

'माँझी' इसका मोह भी त्यागो, जाने भी दो इसकी बात
सारी दुनिया और नहीं कुछ केवल स्याह समन्दर है
                                                    -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Monday, November 23, 2015

257. देखकर दीवार गिरती रो पड़ी छत 


देखकर दीवार गिरती रो पड़ी छत
मुफ़्त में हो जाएगी मेरी फ़ज़ीयत

पूछ ही लें सच के मानी आज उनसे
दे रहे हैं सच की जो हमको नसीहत

हाँ, जवानी में जो वापस लौट आये
पढ़ रहे हैं अब बुढ़ापे में वही ख़त

जानकी, द्रोपद, अहिल्या रो रही हैं
वक़्त ने उनको किया हर बार आहत

नाव से 'माँझी' निकलकर चल दिया जब
मिल गई सारे समन्दर को ही राहत
                                -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. फ़ज़ीयत =निन्दा, अपयश, रुस्वाई, 2.  मा'नी=अर्थ, मतलब।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Sunday, November 22, 2015

256. चली है कौन-सी देखो हवा है 


चली है कौन-सी देखो हवा है
बढ़ा जो दिल का दिल से फ़ासिला है

हमारे साथ ये भी हादिसा है
सभी को चाल पहले-से पता है

हमारे घर का वो ही रास्ता है
जहाँ मौसम भी पानी माँगता है

जिसे सुनकर सभी आँखें हैं झुलसीं
वही ये तब्सिरा हालात का है

किसी के काम शायद आ ही जाए
यहाँ पानी पे इक तिनका पड़ा है

चलो छोड़ो भी इन लहरों को 'माँझी'
समन्दर चीख़ कर अब रो पड़ा है
                            -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Friday, November 20, 2015

255.  मौजूद अँधेरा लगता है 


मौजूद अँधेरा लगता है
अब दूर सवेरा लगता है

मेरा घर देखा तो बोले
भूतों का डेरा लगता है

अब वो सच जो बोल रहा है
गर्दिश ने घेरा लगता है

पार नहीं लगती है कश्ती
क़िस्मत का फेरा लगता है

प्यार यही है शायद 'माँझी'
अपना भी तेरा लगता है
                    -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)


Maujuud andheraa lagtaa hai
Ab door saveraa lagtaa hai

Mera ghar dekhaa to bole
Bhooto'n ka Deraa lagtaa hai

Ab wo sach jo bol rahaa hai
Gardish ne gheraa lagtaa hai

Paar nahi'n lagtii hai kashtii
Qismat ka pheraa lagtaa hai

Pyaar yahi hai shaayad 'Manjhi'
Apnaa bhi teraa lagtaa hai

-Devender Manjhi

Thursday, November 19, 2015

254. ख़ुद को अक्सर टाल गया वो 



ख़ुद को अक्सर टाल गया वो
अपना वक़्त निकाल गया वो

महफ़िल में सन्नाटा पसरा
देकर एक सवाल गया वो


सबको डर था गिर जाने का
अपनी चाल सम्हाल गया वो

आने वाले को देखेंगे-----
जैसा भी था साल गया वो

झूठ-फ़रेब के चक्रव्यूह से
रस्ता साफ़ निकाल गया वो

मछली तड़पी, 'माँझी' तड़पा
फेंक के ऐसा जाल गया वो
                   -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)


Khud ko aksar Taal gayaa wo...
Apna waqt nikaal gayaa wo...

Mehfil mein sannaaTaa pasraa...
Dekar ek sawaal gayaa wo...

Sabko Dar tha gir jaane ka
Apnii chaal samhaal gayaa wo...

Aane waale ko dekhe'nge......
Jaisa bhi tha saal gayaa wo

jhuuTH-fareb ke chakra.vyooh se...
Rastaa saaf nikaal gayaa wo

Machhlee taRRpee, 'Manjhi' taRRpaa
Phei'nk ke aisa jaal gayaa wo...

-Devender Manjhi
 

Wednesday, November 18, 2015

253. भटकता फिरता हूँ मैं जो इधर-उधर यारो 


भटकता फिरता हूँ मैं जो इधर-उधर यारो
किसी प्रेत का साया है मेरे सर यारो

यहाँ पे ज़िक्र न करना था उस सितमगर का
कसक रहेगी मेरे दिल में उम्र भर यारो

पड़ी है जबसे मेरे बीच में वो परछाईं
बदलता रहता हूँ मैं शहर-शहर घर यारो

ये कौन कहता है इक रास्ते के राही हैं
यहाँ जुदा है हर एक  का सफ़र यारो

उसी जगह पे मैं अक्सर क़याम करता हूँ
जहाँ पे ना कोई दीवार है न दर यारो

लगी हैं आके किनारे पे कश्तियाँ 'माँझी'
उठेगा दरिया में शायद कोई भँवर यारो
                                     -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Bhatak.taa phirtaa hu'n mai'n jo idhar-udhar yaaro... 
Kisi preit ka saaya hai mere sar yaaro... 

Yahaa'n pe zikra na karnaa tha us sitamgar ka... 
Kasak rahegi mere dil me'n umr bhar yaaro... 

PaRRee hai jab se mere beech me'n vo parchhaa.ii'n. 
Badaltaa rahtaa hu'n mai'n shahar-shahar ghar yaaro... 

Ye kaun kahtaa hai ik raaste ke raahi hai'n... 
Yahaa'n judaa hai har ek ka safar yaaro... 

Usi jagah pe mai'n aksar qayaam kartaa hu'n... 
Jahaa'n pe naa koi deevaar hai na dar yaaro... 

Lagee hai'n aake kinaare pe kashtiyaa'n 'Manjhi'... 
UTHegaa dariya me'n shaayad koi bha'nwar yaaro.
                                                       -Devender Manjhi


Tuesday, November 17, 2015

252.  जिसने अपना रूप निहारा शीशे में 


जिसने अपना रूप निहारा शीशे में
उसने मेरा नाम पुकारा शीशे में

कल मुझसे ही तो मिलकर वो खोया था
फिरता था जो इक आवारा शीशे में

दुनिया जिसका जश्न मनाती है यारो
रोता है क़िस्मत का मारा शीशे में

मैंने कितनी दहलीज़ों पर पाँव रखे
छाया है जबसे अँधियारा शीशे में

इसने तो प्रतिरूप उतारा तेरा ही
झुँझलाकर क्यों पत्थर मारा शीशे में

'माँझी' उलझन में उलझा है देखो तो
ढूँढ़े है तट का नज़्ज़ारा शीशे में
                             -देवेन्द्र माँझी

Sunday, November 15, 2015

251. उनकी हर इक बात के नखरे 


उनकी हर इक बात के नखरे
देख ज़रा हालात के नखरे

झेल रहे हैं सारे जुगनू
घोर अँधेरी रात के नखरे

सहराओं  को रास न आये
बादल और बरसात के नखरे

दिल पर भारी पड़ जाते हैं
अपने ही जज़्बात  के नखरे

जीत से ज़्यादा दिलकश लगते
'माँझी' अपनी हार के  नखरे
                   -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Unki har ik baat ke nakhre
Dekh zaraa haalaat ke nakhre

Jhel rahe hai'n saare jugnuu
Ghor andheri raat ke nakhre

Sahraao'n ko raas na aaye
Baadal aur barsaat ke nakhre

Dil par bhaari paR jaate hai'n
Apne hi jazbaat ke nakhre

Jeet se zyaada dilkash lagte
'Manjhi' apnii haar ke nakhre

-Devender Manjhi


Monday, November 9, 2015

दीपावली की शुभ-कामनायें

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सभी मित्रों को दीपाववली के पावन पर्व पर हार्दिक शुभ-कामनायें.
                                                              -देवेन्द्र मांझी
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पूजन तो करें मगर संदेश भी समझें

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मित्रो,
दीपावली पर अक्सर सभी लोग गणेश और लक्ष्मी की पूजा करते हैं. धूप-दीप से पूजा करके हम अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं और उस संदेश की ओर बिलकुल भी ध्यान नहीं देते जो हमारे इष्ट-देव हमें देने का प्रयास करते हैं. यही वजह है कि दीवाली के पूजन के उपरान्त भी हमारी स्थिति जस-की-तस बनी रहती है और भविष्य में कोई नई बहार आती दिखाई नहीं देती. आइये, इस बार हम अपने इष्ट-देव के संदेश को समझें और जीवन में नई बहार लायें---

मित्रो,
वास्तव में सभी देवी देवताओं के अनोखे रूप हमें कुछ-न-कुछ संदेश देने के लिये ही हैं. इन रूप-स्वरूपों की पूजा का विधान तो महज इसलिये रखा गया है कि पूजा के नाम पर आप अपने तन-मन की पवित्रता के साथ उपस्थित रहें. उसके बाद आप गणेशजी के स्वरूप को निहारें. ्सबसे पहले आप देखेंगे की एक चौडा माथा है, फ़िर देखेंगे कि दो बडे-बडे कान हैं, फ़िर आपको दो छोटी-छोटी आंखें भी दिखाई देंगी, उसके बाद चार भुजायें दिखाई देंगी. उसके बाद आपको दो बडे-बडे दांत और एक लम्बा सूंड दिखाई देगा. इसके बाद मोटा पेट दिखेगा. मज़े की बात यह है कि हाथी का डीलडौल छोटे-से चूहे पर सवारी करता नज़र आता है.
मित्रो, क्या कभी आपने इस स्वरूप पर कोई चिंतन करने का प्रयास किया? नहीं, तो आइये हमारे साथ---करते हैं इसपर चिन्तन.
सबसे पहले जो बडा माथा दिखाई देता है---वह हमें संदेश देता है कि हमेशा अपना मस्तिष्क बडा रखें और हर बात या विचार को उसमें आने दें. दो बडे कानों की परिकल्पना भी इसी लिये की गयी है कि हर बात को पूरी तरह से सुनें और उसे बडे मस्तिष्क तक पहुंचायें. उस के बाद दो छोटी-छोटी आंखें चिन्तन की स्थिति की ओर इशारा करती हैं, आप जानते ही हैं कि जब आदमी चिन्तन की मुद्रा में होता है तो उसकी आंखें कुछ सिकुड जाती हैं. अत: छोटी आंखें संदेश देती हैं कि जो कुछ भी आपने अपने विशाल मस्तक में इकट्ठा किया है, उस पर भरपूर चिन्तन करो, तथा इस चिन्तन के लिये लम्बा सूंड भी कुछ कहता है. वह इशारा करता हुआ सन्देश देता है कि मस्तक में आई हुई बातों पर कोई निर्णय लेने से पहले अपनी नाक को ज़रा लम्बी करके सूंघो कि उनमें किसी तरह की साजिश की बू तो नहीं आ रही, अगर आपको ज़रा भी साजिश की बू लगे तो उस बात को अपने मस्तक से ऐसे झटक दो जैसे हाथी अपनी सूंड से ज़ोर की हवा निकालकर झटकता है. अब रही चार भुजाओं वाली बात---इसका सीधा मतलब है कि अपने अन्दर दो भुजायें रखनेवाले आम आदमी से दोगुना अधिक ताक़त संजोयें, ताकि कोई आपको बेवजह परेशान करने का साहस न कर सके. अब रही दो लम्बे दांतों की बात. आपने यह कहावत तो सुनी ही होगी कि ’हाथी के खाने के और, दिखाने के और’. मित्रो, यही जीवन का सत्य है, जैसे हम घर में बच्चों को शरारत करने पर उन्हें घुडकी देकर डांटते हैं तो यह सिर्फ़ उन्हें डराने के लिये है, मारने के लिये नहीं. ठीक इसी तरह आप भी अपने व्यवहार को एकदम ऐसा मीठा और कोमल भी न बनाकर रकें कि हर कोई उसे खाने का साहस जुटाने लगे. डर से अनुशासन का़उअम रहता है, महज यही समझाने के लिये बडे दांतों की परिकल्पना की गई है. अब आते हैं उस हास्यास्पद स्थिति की ओर जहां एक तरफ़ तो गणेशजी मोटा पेट लिये हैं और दूसरी तरफ़ चूहे पर सवारी कर रहे हैं. सामन्य अवस्था में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यह कैसे हो सकता है.
मित्रो, मैनें पहले ही लिखा है कि यह स्वरूप कुछ संदेश देने के लिये है.
मोटे पेट का मत्लब है कि आप अपना पेट इतना बडा रखें कि अपने पास आनेवाली सभी बातों को उसमें पचा सको, क्योंकि अगर आपने अपने पास आनेवाली बातों को अपने ही पेट में नहीं पचाया और मोहन की बात सोहन को तथा राम की बात शाम को बताने की कोशिश की तो विवादास्पद स्थिति का बनना और झगडा होना तै है, उसी विवाद और झगडे से बचने के लिये मोटे पेट की कल्पना की गई है, न कि अधिक खाने के लिये.
अब रह गई चूहे पर सवारी करने की बात---मित्रो, इसका सीधा सन्देश है कि जिस प्रकार इतना विशालकाय होते हुए भी गणेशजी छोटे से चूहे पर सवारी कर लेते हैं और चूहा उनके बोझ को अपने शरीर पर लेने में कभी आना-कानी नहीं करता, उसी प्रकार आप भी ध्यान रखें कि किसी पर पूरी तरह आश्रित न हों, अपना वजन इतना सीमित करके रखें कि लोग, रिश्तेदार आपको देखकर अपका स्वागत करें, वे आपको कोई बोझ न समझें, अगर वे आपको बोझ समझने लगेंगे या आप उनपर बोझ बनने लगेंगे तो आपके अपने ही आपसे मुंह चुराने लगेंगे और आप उपेक्षा के शिकार हो जायेंगे.
मित्रो, अब आप देखिय कि उपरोक्त संदेश के अनुसार अगर आप चलते हैं तो यकी़नन आपके जीवन में नई बहार आयेगी--ऐसा मेरा मानना है, और आप भी उसी तरह लक्ष्मी अर्थात धन-दौलत औरखुशियों की गोद में खेलते नज़र आयेंगे, जैसे गणेशजी लक्ष्मी जी की गोद में।

(मित्रो, अगर आप मुझसे सहमत है तो मेरे लेख को आप भी पोस्ट ्करें)

250. चेहरे के पन्ने से मन की सारी बातें बाँच गया 


चेहरे के पन्ने से मन की सारी बातें बाँच गया
ख़ूब परख रखता है ज़ालिम, एक नज़र में जाँच गया

सिर्फ़ धुआँ-सा रहता हूँ मैं तन्हाई के साये में
याद का पैकर आज लगाकर दिल में ऐसी आँच गया

लौहूलुहान हुए हैं तलवे लेकिन दोष मँढू किसपर
सारा आलम राह में मेरी आज बिछाकर काँच गया

कौन मुहब्बत की सौग़ातें बाँटे मेरे आँगन में
मेरा साया ही जब मुझसे करके तीन-औ-पाँच गया

था ही अद्भुत दृश्य उपस्थित यार समन्दर में उस दम
मस्ती में आकर लहरों पर 'माँझी' मार कुलाँच गया
                                                      -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Chehre ke panne se man ki saari baate'n baa'nch gayaa, 
BaRaa paarkhi hai vo yaaro, ek nazar me'n jaa'nch gayaa 

Sirf dhu.aa'n-saa rahtaa hu'n mai'n tanhaaii ke saaye me'n... 
Yaad ka paikar aaj lagaa kar dil me'n aisii aa'nch gayaa 

Lahuu-luhaan hu.e hai'n talwe lekin dosh maDHuu kis par 
Saara aalam raah me'n meri aaj bichhaa.kar kaa'nch gayaa 

Kaun muhabbat ki saughaate'n baa'nte mere aa'ngan me'n... 
Mera saaya hi jab mujh se karke teen-o-paa'nch gayaa 

Thaa hi adbhut drishya upasthit yaar samandar me'n us dam 
Masti me'n aakar lahro'n par 'Manjhi' maar kulaa'nch gayaa 
                                                       -Devender Manjhi 

Adbhut = Hairat-angez Drishya = Manjar Upasthit = Haazir

Sunday, November 8, 2015

249. तेल, नमक, आटे की बात 


तेल, नमक, आटे की बात
सब हैं सन्नाटे की बात

उम्र बढ़ी है बिटिया की
कैसी खर्राटे की बात

सच का चर्चा छोड़ो भी
ये भी है घाटे की बात

साँप से ज़्यादा ज़हरीली
इन्साँ के काटे की बात

'माँझी' के हिस्से आईं
ज्वार कभी भाटे की बात
                 -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Tel, namak, aaTe ki baat 
Sab hai'n sannaaTe ki baat 

Umr baDHee hai biTiyaa ki 
Kaisi kharraaTe ki baat 

Sach ka charchaa chhoRRo bhi 
Ye bhi hai ghaaTe ki baat 

Saa'np se zyaada zahreelii 
Insaa'n ke kaaTe ki baat 

'Manjhi' ke hisse aa_iiN 
Jwaar kabhi bhaaTe ki baat 
                    -Devender Manjhi

Friday, November 6, 2015

248. पागलपन है आस---यहाँ सब चलता है 


पागलपन है आस---यहाँ सब चलता है
झूठा हर विश्वास ---यहाँ सब चलता है

बाहुबल दिखलाये या कि सियाहरण को
रावण ले संन्यास  ---यहाँ सब चलता है

रुक्मणि घर में फिर भी राधा संग सदा
कृष्ण रचाये रास ---यहाँ सब चलता है

मुट्ठी मेरी गर्म करोऔर निकलो भी
तुम हो मेरे ख़ास---यहाँ सब चलता है

'माँझी' भी आदर्शों की नैया लेकर
काट रहे बनवास ---यहाँ सब चलता है
                                        देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

  Paagal.pan hai aas---yahaa'n sab chaltaa hai 
JhooTHaa har vishwaas---yahaa'n sab chaltaa hai 

Bahubal dikhlaaye ya ki siyaa haran ko 
"Raavan" le sanyaas---yahaa'n sab chaltaa hai 

"Rukmini" ghar me'n phir bhi "Radha" sa'ng sadaa 
"Krishna" rachaaye raas---yahaa'n sab chaltaa hai 

MuTTHee meri garm karo aur niklo bhii 
Tum ho mere KHaas---yahaa'n sab chaltaa hai 

 'Manjhi' bhi aadarsho'n ki naiyyaa lekar 
kaaT rahe banwaas---yahaa'n sab chaltaa hai 
                                         -Devender Manjhi 
( 'majbuuriyaa'n meri' se )

Thursday, November 5, 2015

247.  लपटें मारेंगी किलकारी शर्त लगा ले 


लपटें मारेंगी किलकारी शर्त लगा ले
आज जलेगी बस्ती सारी शर्त लगा ले

हर युग के चौराहे पर मिलना है तुझसे
चाहे मुझसे कैसी भारी शर्त लगा ले

जीत के द्वार खुले हैं तुझपर आज अचानक
भाड़ में जाए दुनियादारी शर्त लगा ले

इससे बढ़कर और नहीं होगी लफ़्फ़ाज़ी
जैसी अब है मारामारी शर्त लगा ले

नाव न बढ़ती आगे 'माँझी' आज तुम्हारी
लहरें करती हैं मक्कारी शर्त लगा ले
                              -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

LapTe'n maare'ngii kil.kaari shart lagaa le 
Aaj jalegii bastii saarii shart lagaa le 

Har yug ke chauraahe par milnaa hai tujh se 
Chaahe mujh se kaisii bhaarii shart lagaa le 

Jeet ke dwaar khule hai'n tujh par aaj achaanak 
BhaaRR me'n jaaye duniyadarii shart lagaa le 

Is se baRHkar aur nahi'n hogi laffaazii 
Jaisi ab hai maara-maaree shart lagaa le 

Naav na baRHtee aage 'Manjhi' aaj tumhaari 
Lahre'n kar.tii hai'n makkaaree shart lagaa le 
                                    -Devender Manjhi 
( "majbooriya'n meri" se )

Wednesday, November 4, 2015

246. हाँ, सपन साकार ना हो पाये हैं अक्सर बहुत 


हाँ, सपन बिखरे हमारे टूटकर अक्सर बहुत
हैं ख़यालों के हमारे साथ भी लश्कर बहुत

नाग बाँबी से निकलकर कब गया पकड़ा भला
बीन भी बजती रही, फूँके गए मन्तर बहुत

अर्थ हमने रख दिए उनके बदलकर सब यहाँ
ख़ून के से घूँट पीकर रह गए अक्षर बहुत

ये हमारा हौसला था जो छुआ आकाश को
था उड़ानों पर अँधेरी आँधियों का डर बहुत

देवता आते नहीं क्यों 'माँझी' मंथन के लिए
देखने को सागरों के अब भी हैं मंज़र बहुत
                                    -देवेन्द्र माँझी

('मजबूरियाँ मेरी' से)

Haa'n, sapan bikhre hamaare TuuT_kar aksar bahut 
Hai'n KHayaalo'n ke hamaare saath bhi lashkar bahut 

Naag baa'mbii se nikal kar kab gayaa pakRaa bhalaa... 
Been bhi bajtee rahi, phuu'nke gaye mantar bahut 

Arth hamne rakh diye unke badal kar sab yahaa'n... 
Khoon ke se ghoo'nT peekar rah gaye akchhar bahut 

Ye hamaara hausalaa thaa jo chhu.aa aakaash ko... 
Thaa uRaano'n par andheri aandhiyo'n ka Dar bahut 

Dev.taa aate nahi'n kyo'n 'Manjhi' manthan ke liye... 
Dekhne ko saagaro'n ke ab bhi hai'n manzar bahut 
                                             -Devender Manjhi 
 ( 'Majbuuriyaa'n meri' se )

Tuesday, November 3, 2015

भावी पीढ़ियों को भी रौशनी देती हैं उस्तादों की इस्लाहें 

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ग़ज़ल आज सर्वाधिक लोकप्रिय काव्य-विधा के रूप स्थापित हो रही है तो उसका एकमात्र कारण यह है कि इसका दो पंक्तियों का एक शे'र किसी भी पाठक/ श्रोता को आह या वाह करने पर मजबूर कर देता है। शे'र के इस चमत्कार को तग़ज़्ज़ुल कहते हैं। शे'र में निखार लाने और उसमें तग़ज़्ज़ुल पैदा करने में उस्ताद शाइरों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। दरअस्ल, उर्दू शाइरी में इस्लाह लेने-देने का रिवाज़ शाइरी के जन्मकाल से ही चला आ रहा है। शे'र कहना उतना मुश्किल नहीं, जितना की उसका समझना। इस सम्बन्ध में सुप्रसिद्ध विद्वान् लेखक अयोध्या प्रसाद गोयलीय ने वर्ष-1966 में अपनी एक पुस्तक में ठीक ही लिखा था कि 'लगन और परिश्रम के बल-बूते पर शे'र कहने का अभ्यास तो हो सकता है, किन्तु शे'र को समझना, परखना, उसकी अच्छाई-बुराई, ख़ूबी और ऐब पर आलोचनात्मक दृष्टि पड़ना बहुत मुश्किल है। यदि नीर-क्षीर विवेक-दृष्टि सौभाग्य से प्राप्त हो भी जाए तो शे'र के ऐबों को निकालकर उसे चमका देना हर उस्ताद के वश का रोग नहीं। सोने के खरे-खोटे की परख तो सर्राफ़ कर सकता है, परन्तु उसका खोट निकालकर उसे शुद्ध बनाना उसके वश का नहीं, यह काम सुनार ही कर सकता है।'
'इस्लाह देने की क्षमता केवल---छन्दशास्त्र, अलंकार, साहित्य आदि में पारंगत होने से नहीं आती, अपितु उसके लिए ----शाइराना सूझ-बूझ, स्वानुभव और विवेक-बुद्धि भी अत्यन्त आवश्यक है। इस्लाह से न सिर्फ़ शागिर्द को ही लाभ पहुँचता है, अपितु उस्ताद का अभ्यास भी बढ़ता है और निरन्तर उसके काव्य-कौशल में निखार आता चला जाता है तथा नई-नई जानकारियों के लिए अध्ययन की भी प्रवृत्ति बढ़ती जाती है, ताकि वह अपने शिष्यों को इस कला में पारंगत कर सके। उस्तादों के मुद्रित कलाम से यह तो ज्ञात हो सकता है कि वे   स्वयं क्या कहते थे और कैसा कहते थे, किन्तु उनकी समालोचक दृष्टि और सूझ-बूझ का अनुमान तो उनके  द्वारा दी गईं इस्लाहों से ही हो सकता है कि शागिर्द ने क्या कहा और उस्ताद ने तनिक-से संशोधन से उसे क्या बना दिया?'
'इस्लाह' के सम्बन्ध में सफ़दर मिर्जापुरी की सोच कुछ ज़ियाद: ही सार्थक और दूर तक जानेवाली साबित हो रही है। वे सोचते थे कि उस्ताद अपने शागिर्द को इस्लाह देता है और शागिर्द उस संशोधन के हिसाब से अपना शे'र ठीक कर लेता है तो इसमें न तो यह पता चलता है की शागिर्द ने पहले अपना शे'र क्या कहा था और न ही यह पता लगता है कि उस्ताद ने अपने शागिर्द को क्या इस्लाह दी। इतना ही नहीं, सफ़दर साहब यह भी सोचते थे कि जो ग़लतियाँ आज का शाइर कर रहा है, ऐसी ग़लतियों को भविष्य के शाइर भी तो कर सकते हैं, फिर उन्हें समझाने आज के उस्ताद शाइर कहाँ से आएँगे ? ऐसे में अगर इन इस्लाहों का संकलन कर लिया जाए तो ये भावी पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त करने में कारगर साबित होंगी। इस विचार के दिमाग़ में आते ही उन्होंने उन इस्लाहों को एकत्रित करने का निर्णय कर डाला। वे उस्तादों द्वारा दी गईं इस्लाहों को एकत्रित करने के लिए दीवानों की तरह लखनऊ के गली-कूचों में उस्तादों के दरों की ख़ाक छानने लगे। शुरू-शुरू में कुछ ने यह कहकर उन्हें टरकाया---"हमारे कलाम पर उस्ताद ने इस्लाह देने की ज़रुरत ही महसूस नहीं की और हमने अपने शागिर्दों को दी गईं इस्लाहों की नक़ल नहीं रक्खी।" कुछ ने यह कहकर चलता किया ---"हमें जो इस्लाहें दी गईं थीं, उन्हें हमने अपनी ब्याज (कविता संकलन) में नोट करने के बाद ज़ाया (नष्ट) कर दिया। अगर यह मालूम होता कि कोई अदीब इस्लाहों को भी शाया (प्रकाशित) करेगा तो सहेजकर रख लेते।" लेकिन सफ़दर निराश नहीं हुए। वे अपनी धुन के पक्के थे। तीन वर्ष तक लगातार भाग-दौड़ करने पर वर्ष-1918 में इस्लाहों का प्रथम संकलन 'मुश्शानए-सुखन', सिद्दीक़ बुक डिपो लखनऊ, और वर्ष-1928 में द्वितीय संकलन लाहौर के प्रकाशक 'ताजराने-कुतुब' से प्रकाशित कराने में सफल हो ही गए। पहले संकलन में 37 उस्तादों की इस्लाहें और दूसरे में 62 उस्तादों की इस्लाहें  संकलित थीं। सफ़दर साहब ने सचमुच ऐसी नायाब पुस्तक तैयार करके दी कि जो आज तक भी नए शाइरों को रौशनी दिखा रही है। आइये, इस पुस्तक में दी गईं कुछ इस्लाहों पर नज़र डालते हैं--
'राज़' अहसनी बहुत ऊँचे दर्ज़े के शाइरों में शुमार होते हैं और उन्हें उस्तादी का मर्त्तबा भी हासिल था। उन्होंने शे'र कहा ---
"हमारे आशियाँ से आस्माँ तक रोक ही क्या थी
बलाए-बर्क़ से महफूज़ क्योंकर आशियाँ करते"
देखने-सुनने में बहुत अच्छा शे'र है, किन्तु बाबए-उर्दू 'जोश' मलसियानी-जैसे वयोवृद्ध और सिद्धहस्त की आलोचक दृष्टि से शे'र की ये तनिक-सी ख़ामी छिपी न रह सकी। बिजली आसमान से ज़मीं पर गिरती है। अत: बिजली की रवानगी के मुक़ाम का उल्लेख पहले और मंज़िल पर पहुँचने का बाद में होना चाहिए था। अत: उन्होंने शे'र के पहले मिस्रे को इस तरह परिवर्तित कर दिया--
"रुकावट कौन-सी थी चर्ख़ से शाख़े-नशेमन तक"
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स्वानुभव की कमी के कारण भी कभी-कभी ऐसी भूलें हो जाती हैं कि अच्छे-अच्छे उस्ताद उन अस्वभाविकताओं को नहीं भाँप पाते। 'अहसान' माहरहरवी मिर्ज़ा 'दाग़' के योग्य शिष्य थे। शिष्यों की डाक द्वारा आई हुई ग़ज़लों को अक्सर वे पढ़कर दाग़ साहब को सुनाते थे और जो इस्लाह उस्ताद फ़रमाते थे, लिखकर शिष्यों को वापस भिजवा देते थे। ऐसे दक्ष शागिर्द जब अपना यह शे'र इस्लाह के लिए पेश किया
"किसी दिन बेख़ुदी में जा पड़े थे उनके सीने पर
बस इतनी-सी ख़ता पर हाथ कुचले उसने पत्थर से"
मिर्ज़ा दाग़ के पास बैठी हुई तवायफ़ शे'र सुनकर मुस्कुराई। अहसन तो बेचारे मौलाना और ज़ाहिदे-ख़ुश्क थे। इस मुस्कान का रहस्य समझना उनकी समझ से बाहर था, किन्तु मिर्ज़ा दाग़-जैसा स्वानुभवी भाँप गया। फ़रमाया --"बेख़ुदी में केवल एक ही हाथ सीने पर पड़ना मुमकिन है, दोनों हाथ तो अनजाने में नहीं जान-बूझकर ही पड़ते हैं। शे'र यूँ बना लो---
"किसी दिन बेख़ुदी में जा पड़ा था उसके सीने पर
बस इतनी-सी ख़ता पर हाथ कुचला उसने पत्थर से"
मिर्ज़ा सुलेमान जाह 'अंजुम' उस्ताद हैदरअली तबातबाई 'नज़्म' से अपनी ग़ज़ल पर इस्लाह लेकर जा रहे थे कि रास्ते में नवाब अख़्तर महल बेगम को सलाम करने के लिए उनके दौलतख़ाने पर चले गए। बेगम साहिब शायरा तो न थीं, हाँ सुख़न-फ़हम ज़रूर थीं ताज़ा ग़ज़ल सुनाने की फ़रमाइश पर अपनी इस्लाहशुदा ग़ज़ल पढ़नी शुरू की। जब यह शे'र पढ़ा---
"दम मेरा निकला तेरे वादे के साथ
तेरी घबराई हुई हाँ की तरह"
 …तो बेगम ने मुस्कुराते हुए पूछा---क्या उसने घबराकर कहा था कि 'हाँ'? फिर फ़रमाया यूँ पढ़िए--
"दम मेरा निकला तेरे वादे के साथ
तेरी शरमाई हुई हाँ की तरह"
 दरअसल, उस्ताद ने इस्लाह तो दे दी परन्तु नारी-सुलभ इस अदा का अनुभव न होने से मात खा गए। शे'रो-शाइरी ऐसा असीम सागर है जिसमें अच्छे-अच्छे तैराक गोते खा जाते हैं। 'हातिम' अपने ज़माने में बहुत अच्छा उस्तादाना मर्त्तबा रखते थे। अपने कुछ शागिर्दों के साथ बैठे हुए थे। फ़रमाइश पर अपनी ग़ज़ल का यह मतला पढ़ा---
"सर को पटका है कभू, सीना कभू कूटा है
रात हम हिज्र की दौलत से मज़ा लूटा है"
शागिर्दों में मियाँ सआदत खां 'रंगीं' भी बैठे हुए थे उन्होंने बा-अदब अर्ज़ किया---'उस्ताद मतला तो बहुत अच्छा है लेकिन दूसरे मिस्रे में ज़रा-सी तरमीम की ज़रुरत है।' उस्ताद ने पूछा--'वो क्या?' रंगीं ने हाथ बाँधकर अर्ज़ किया--'मेरी नाक़िस राय से दूसरा मिस्रा यूँ रहना चाहिए ---
"हमने शबे-हिज्र की दौलत से मज़ा लूटा है"
उस्ताद ने ग़ौर किया तो मालूम हुआ कि 'हम लूटा है' भाषायिक दृष्टिकोण से अशुद्ध है। 'हमने लूटा है' कहना चाहिए था। उस्ताद ने रंगीं की इस इस्लाह को बेतकल्लुफ़ क़ुबूल कर लिया और सबके सामने रंगीं की सराहना भी की
जैसी भाषाई चूक, और स्वानुभव की कमी से शे'र में कमी पहले रहती थीं, वैसी ही संभावना अब भी रहती है मगर समझदार शाइर अपने उस्ताद से इस्लाह लेकर और इस पुस्तक में दी गईं पुराने उस्ताद शाइरों की इस्लाहों को पढ़कर अपनी कमियाँ दूर करने का प्रयास तो करते ही हैं, शायरी को समृद्ध भी बनाते हैं
--प्रस्तुति : देवेन्द्र माँझी
आर-जैड-25-डी, गली--5,
सिंडिकेट इन्क्लेव, पंखा रोड,
नई दिल्ली--110045
मो- 09810793186
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245. जब तेरी अंगड़ाई पर नज़रें अटककर रह गईं 

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जब तेरी अंगड़ाई पर नज़रें अटककर रह गईं
शहर की तन्हाइयाँ मुझमें भटककर रह गईं

रात-भर पूरी तरह मुझपर नज़र गाड़े रहीं 
चाँद की किरणें मेरे दिल में खटककर रह गईं

साँस तक भी ले न पाई एक पल भी चैन से
मेरी उम्मीदें न जाने क्या सटककर रह गईं

वक़्त के हाथों हुईं मजबूर तो सच मानिए
ख्वाहिशें हालात से उलटी लटककर रह गईं

चीरकर सागर का सीना जब कभी 'माँझी' चला
थूक अपना सारी लहरें ही सटककर रह गईं
                                    -देवेन्द्र माँझी

('मजबूरियाँ मेरी' से)
Jab teri angDaai par nazare'n aTak kar rah ga_iiN 
Shahar ki tanhaaiyaa'n mujhme'n bhaTak kar rah ga_iiN

Raat-bhar puuri tarah mujh par nazar gaaDe rahii'n 
Chaa'nd ki kirane'n mere dil me'n khaTak kar rah ga_ii'n 

Saa'ns tak bhi le na paa_ii ek pal bhi chain se 
Meri ummeede'n na jaane kya saTak kar rah ga.ii'n 

 Waqt ke haatho'n hu_ii'n majbuur to sach maaniye 
KHwaahishe'n haalaat se ultii laTak kar rah ga.ii'n 

Cheer kar saagar ka seenaa jab kabhi 'Manjhi' chalaa 
Thuuk apna saari lahare'n hi saTak kar rah ga_iiN 
                                  -Devender Manjhi ('Majbuuriyaa'n meri' se)

Monday, November 2, 2015

244. गर ये आँख पनीली ना हों 

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गर ये आँख पनीली ना हों
लाल-ओ-पीली, नीली ना हों

अँधियारे का  ख़ाक मज़ा है
जब तक रात नशीली ना हों

ऐसे कैसे हो सकता है
पगडण्डी सर्पीली ना हों

बेमानी बारूद है सारा
माचिस की गर  तीली ना हों

कोई भी आकार न मिलता
जब-तक मिट्टी गीली ना हों
                        -देवेन्द्र माँझी

('मजबूरियाँ मेरी' से)

Friday, October 30, 2015

243. सबको चक्कर में डालकर निकला 


सबको चक्कर में डालकर निकला
ऐसा फ़िकरा उछाल कर निकला

खा गया ठोकरें ज़माने की
ख़ाक वो देख-भालकर निकला

किसको दीखा वो भोर का तारा
जब वो सूरज निकालकर निकला

दिल की कालिख छुपा नहीं पाया
लाख ख़ुदको उजालकर निकला

कुछ न आया था हाथ 'माँझी' के
जब वो दरिया खंगालकर निकला
                             -देवेन्द्र माँझी

('मजबूरियाँ मेरी' से)

242. वक़्त की इस चाल को अब मोड़ दे 


वक़्त की इस चाल को अब मोड़ दे
ख़ून पीती रूढ़ियों को तोड़ दे

आप दे देगा उड़ानों के सबूत
इस परिन्दे को खुला तू छोड़ दे

हाथ में अब आब ले सच्चाई का
झूठ की गगरी को अब तू फोड़ दे

लोग पढ़ लेंगे तुझे इतिहास में
इक नया अध्याय इसमें जोड़ दे

हर कोई कहता मिला 'माँझी' से ये
इस नदी के पार मुझको छोड़ दे
                          -देवेन्द्र माँझी

241. इससे तो बेकारी अच्छी 


इससे तो बेकारी अच्छी
हाथ कटाकर मिलती रोज़ी

बिन इसके भी काम चले ना
बेशक ये माया है ठगनी

रोम जले तो जलने भी दो
नीरो की बजती है बंसी

आज अदब की हर महफ़िल है
चौराहे की सब्ज़ी-मण्डी

किस-किसको ये पार करेगी
जर्जर होती 'माँझी' कश्ती
                   -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. रोज़ी=आजीविका, 2. अदब=साहित्य। 

('मजबूरियाँ मेरी' से)

Thursday, October 29, 2015

240. सम्बन्धों ने आँख तरेरी इधर-उधर 


सम्बन्धों ने आँख तरेरी इधर-उधर
आज लगी है तेरी-मेरी इधर-उधर

नंगापन अब झूम रहा है बना-ठना
लाज-शरम फ़ैशन ने घेरी इधर-उधर

देख के चेहरा कोई डरे ना इसीलिये
आज मुखौटों की है फेरी इधर-उधर

बैठी है थक-हार के युग की नई हवा
 थाम निराशाओं की ढेरी इधर-उधर

ख़ौफ़ज़दा 'माँझी' सागर से निकल गया
लहर बनीं तूफ़ाँ की चेरी इधर-उधर
                                  देवेन्द्र माँझी

('मजबूरियाँ मेरी' से) 

Sambandho'n ne aa'nkh tarerii idhar-udhar
Aaj lagii hai teri-meri idhar-udhar

Na'ngaapan ab jhoom rahaa hai banaa-THanaa
Laaj-sharam faishan ne gheri idhar-udhar

Dekh ke chehraa koi darey naa isiiliye
Aaj mukhauTo'n ki hai pheri idhar-udhar

baiTHee hai thak-haar ke yug ki na.ii hawaa
Thaam niraashaao'n ki DHerii idhar-udhar

KHaufzadaa 'Manjhi' saagar se nikal gayaa
Lahar banii'n toofaa'n ki cherii idhar-udhar

-Devender Manjhi

( " Majbooriyaa'n meri" se )

Tuesday, October 27, 2015

239. जब वो ज़ाहिर हुआ दीवार का साया बनके 


जब वो ज़ाहिर हुआ दीवार का साया बनके
रह  गई  सारी  ख़ुदाई  भी  तमाशा  बनके

हो सकी हमसे न पहचान की किस हाल में था
वो  नमूदार  हुआ  बज़्म  में क्या-क्या  बनके

ज़िन्दगी होगी यो फ़ुर्क़त में गुज़र जायेगी
 क्या करेगा वो मेरे ग़म का मुदावा बनके

इक मुसाफ़िर था पहुँचना था जिसे मंज़िल पर
उसको  लूटा  है  सरे-राह  फ़रिश्ता  बनके

झील होती तो मुहब्बत के कँवल खिल जाते
तूने दिल तोड़ दिया 'माँझी' का दरिया बनके
                                          देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. नमूदार=प्रकट, 2. बज़्म=महफ़िल, 3. फ़ुर्क़त=जुदाई, 4. मुदावा=इलाज।

('मजबूरियाँ मेरी' से)

Jab vo zaahir hu.aa deewaar ka saaya ban ke
Rah ga.ii saari khudaa.ii bhi tamaasha ban ke 

Ho saki hamse na pahchaan ki kis haal me'n tha 
Vo namuudaar hu.a bazm me'n kya-kya ban ke 

Zindagi hogi yo'n furqat me'n guzar jaayegi 
Kya karega vo mere gham ka mudaawa ban ke 

Ik musafir tha pahu'nchnaa tha jise manzil par 
Usko lootaa hai sar-e-raah farishtaa ban ke 

Jheel hoti to muhabbat ke ka'nwal khil jaate 
Tuu ne dil toRR diya 'Manjhi' ka dariya ban ke 
                                           -Devender Manjhi 
1. Namoodaar = prakat 2. Bazm = mahfil 3. Furqat = judaai 4. Mudaawa = ilaaj