244. गर ये आँख पनीली ना हों
----------------------------------------------------------------------------------------गर ये आँख पनीली ना हों
लाल-ओ-पीली, नीली ना हों
अँधियारे का ख़ाक मज़ा है
जब तक रात नशीली ना हों
ऐसे कैसे हो सकता है
पगडण्डी सर्पीली ना हों
बेमानी बारूद है सारा
माचिस की गर तीली ना हों
कोई भी आकार न मिलता
जब-तक मिट्टी गीली ना हों
-देवेन्द्र माँझी
('मजबूरियाँ मेरी' से)
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