Thursday, July 7, 2016

356. इतना शोर मचाकर मुझमें 


इतना शोर मचाकर मुझमें
झाँका किसने आकर मुझमें

खोया कौन भरी महफ़िल में
अपना अक़्स छुपाकर मुझमें

मस्त हुआ वो घूम रहा है
शर्म-हया सिमटाकर मुझमें

आँख समन्दर कर देते हैं
याद के बादल छाकर मुझमें

उतरेगा लहरों पर 'माँझी'
फिर तूफ़ान उठाकर मुझमें
                     देवेन्द्र माँझी

Monday, July 4, 2016

355. मैं महज इस वास्ते ही आऊँगा -- कहता था वो 


मैं महज इस वास्ते ही आऊँगा -- कहता था वो
आईनों को आईना दिखलाऊँगा -- कहता था वो

हदिसों की भीड़ में गुम आज हूँ तो क्या हुआ
एक दिन सबका पता बन जाऊँगा -- कहता था वो

ये नगर जब धुंध में लिपटेगा तब सच मानिए
धूप की बनकर रिदा मैं छाऊंगा -- कहता था वो

जाते दम भी वो तसल्ली दे के यूँ बहला गया
आऊँगा इक बार मैं फिर आऊँगा -- कहता था वो

बंद है तो ठीक है, हो तुम भी ख़ुश और मैं भी ख़ुश
खोलकर मुट्ठी तुम्हें उलझाऊँगा -- कहता था वो

छोड़कर काग़ज़ की कश्ती जाने दो बच्चों को तुम
मैं हूँ 'माँझी' पार मैं ले जाऊँगा -- कहता था वो
                                        -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. रिदा=चादर।

(हादिसा हूँ मैं' से)

MaiN mahaj is waastey hi aauNgaa -- kahtaa thaa vo ...
AaiinoN ko aaiinaa dikhlaauNgaa -- kahtaa thaa vo ...

HaadisoN kii bheeD meiN gum aaj hooN tou kyaa huaa ...
Ek din sab ka pataa ban jaauNgaa -- kahtaa thaa vo ...

Ye nagar jab DHuNDH meiN liptegaa tab sach maaniye ...
Dhoop ki ban kar ridaa maiN chhaauNgaa -- kahtaa thaa vo ...

Jaate dam bhi vo tasallee de ke yuuN bahlaa gayaa ...
AauNgaa ik baar maiN phir aauNgaa -- kahtaa thaa vo

BaNd hai tou THeek hai, ho tum bhi KHush aur maiN bhi KHush ...
Khol kar mutTHee tumheiN uljhaauNgaa -- kahtaa thaa vo ...

ChhoRRkar Kaaghaz ki kashtee jaane do bachchoN ko tum ...
MaiN hooN 'Manjhi' paar maiN le jaauNgaa -- kahtaa thaa vo ...

                                                                   ~ Devender Manjhi

Sunday, July 3, 2016

354. मुझको पास बुलाती क्यों है 


मुझको पास बुलाती क्यों है
मंज़िल मुझे रिझाती क्यों है

धूप की शै पर ये परछाई
मुझसे आगे जाती क्यों है

आज हवा तेरी खुशबू ले
मेरे घर में आती क्यों है

ख़्वाबों की चिंगारी आकर
मेरी पलक जलाती क्यों है

'माँझी' की कश्ती सागर में
आज क़यामत ढाती क्यों है
                   देवेन्द्र माँझी

353. हँसने का मन लौटा भी दो 


हँसने का मन लौटा भी दो
हाँ, वो बचपन लौटा भी दो

जिसमें उभरे अक्स प्यार का
ऐसा दरपन लौटा भी दो

शहर की ओ सपनीली गालिओ!
निर्धन का धन लौटा भी दो

ये कहकर माँगूँ मैं तुमको
मेरा जीवन लौटा भी दो

सूनापन संन्यासी होगा
याद का चन्दन लौटा भी दो
                  -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

HaNsne ka man lautaa bhi do
HaaN, vo bachpan lautaa bhi do

Jis meiN ubh.re aks pyaar kaa
Aisaa darpan lautaa bhi do

Shahar ki o sapniilee galiyoN
Nirdhan ka dhan lautaa bhi do

Ye kah kar maaNgooN maiN tum ko
Meraa jeevan lautaa bhi do

Soonaapan sanyaasii hogaa
Yaad ka chandan lautaa bhi do

               ~ Devender Manjhi