354. मुझको पास बुलाती क्यों है
मुझको पास बुलाती क्यों है
मंज़िल मुझे रिझाती क्यों है
धूप की शै पर ये परछाई
मुझसे आगे जाती क्यों है
आज हवा तेरी खुशबू ले
मेरे घर में आती क्यों है
ख़्वाबों की चिंगारी आकर
मेरी पलक जलाती क्यों है
'माँझी' की कश्ती सागर में
आज क़यामत ढाती क्यों है
देवेन्द्र माँझी
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