Tuesday, January 17, 2017

369.  कितनी आवारागर्द हस्ती है


कितनी आवारागर्द हस्ती है
कोई घर है न कोई बस्ती है

चाँदनी रात के उजालों में
रहगुज़र धूप को तरसती है

आग उगलता है दामने-सहरा
जब भी काली घटा बरसती है

यूँ तो कहने को लोग कहते हैं
ज़िन्दगी से भी मौत सस्ती है

बिन पिए नशा हो गया 'माँझी'
आज मौसम में कितनी मस्ती है
--देवेन्द्र माँझी



Wednesday, November 16, 2016

368. मुझको जब मुश्किल में जीना आ गया 


मुझको जब मुश्किल में जीना आ गया
दुश्मनों को भी पसीना आ गया

अब न ढूँढेंगे रफूगर शहर में
ऐ मुहब्बत चाक सीना आ गया

साक़िया ये सागरो-मीना उठा
मुझको पीने का क़रीना आ गया

मुझको तो इक बूँद पानी है गरां
तुझको कैसे ज़हर पीना आ गया

आँख ही उस वक़्त 'माँझी' की खुली
जब किनारे पर सफ़ीना आ गया
                       --देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Tuesday, October 18, 2016

367.  हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता


हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता
सामने मंज़िल के धोका खा गए

ग़ैर पर नज़रे-इनायत देखकर
हम तेरी मह्फ़िल से उठकर आ गए

किसलिए ये ग़म की बदली छा गयी
फूल क्यों बादे-सबा कुम्हला गए

बेनियाज़ी का हमें कुछ डर नहीं
लोग अब तो तेरी आदत पा गए

उनसे मिलना भी क़यामत हो गया
सैकड़ों इल्ज़ाम सर पर आ गए

जा के किससे हाले-दिल 'माँझी' कहे
ज़ख्म सीने के वो सब दिखला गए
--देवेन्द्र माँझी


हादिसा हूँ मैं' से

Monday, October 10, 2016

366. हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता



हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता
वो चाँद खुलके लबे-बाम क्यों नहीं आता

ज़रा बताओ तो ये आप और तुम क्या है
तेरी ज़बां पे मेरा नाम क्यों नहीं आता

पढ़े तो कैसे पढ़े कोई कोरे काग़ज़ को
लिखाहुआ तेरा पैग़ाम क्यों नहीं आता

वो सह रहे हैं गयी रात आहटों के सितम
वो शख्स घर पे सरे-शाम क्यों नहीं आता

अज़ीब दर्दे-मुहब्बत भी शै है क्या 'माँझी'
दवाएँ लेता हूँ आराम क्यों नहीं आता
-देवेन्द्र माँझी

Thursday, September 8, 2016

366.  पतझड़ भी अपना रंग दिखाती तो है अभी 


पतझड़ भी अपना रंग दिखाती तो है अभी
उड़-उड़के धूल सर पे ये आती तो है अभी

माना शगुफ़्तगी रुख़े-गुल पर नहीं है अब
ख़ुशबू तेरे बदन की लुभाती तो है अभी

आये न आये बादे-सबा इसका ग़म नहीं
कोयल कोई दरख़्त पे गाती तो है अभी

अय दश्ते-नामुराद सलीबों के शहर में
दुनिया हमारा जश्न मनाती तो है अभी

आवाज़ देके 'माँझी' कोई नील की दुल्हन
लहरों के दरम्यान बुलाती तो है अभी
                                     -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. शगुफ़्तगी=प्रफुल्लता, खिले होने का भाव, 2. रुख़े-गुल=फूल का चेहरा अर्थात पुष्प, सुमन, 3. बादे-सबा=पुरवा हवा, ठण्डी व मोहक पवन, 4. दश्ते-नामुराद=असफलताओं का जंगल, 5. नील की दुल्हन=नील नदी।

('हादिसा हूँ मैं' से )

Wednesday, September 7, 2016

365.  शहरे-आसेब में चलता हुआ जादू रोको


शहरे-आसेब में चलता हुआ जादू रोको
सूनी गलियों में ये बजते हुए घुँघरू रोको

इन बगूलों को पकड़ने से नहीं कुछ हासिल
हो सके सहरा-ब-सहरा रमे-आहू रोको

उलटे पलड़ों से ही तौला है ज़माना तुमने
मेरी झोली में तो दुनिया है तराज़ू रोको

सूंघते-सूंघते आ जाए न खूंखार कोई
दो मुहब्बत-भरे इन जिस्मों की खुशबू रोको

हिज्र की राह में हँस-हँस के गुज़रना होगा
फूल बरसाते बढ़ो, ख़ून के आँसू रोको

कहीं बन जाए ना दरिया की रवानी तूफाँ
'माँझी' बल खाते हुए नाव के अबरू रोको
                                    -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. शहरे-आसेब=भूतों का नगर, 2. सहरा-ब-सहरा=जंगल-जंगल, रेगिस्तान में, 3. रमे-आहू=हिरनी की चाल, 4. हिज्र=विरह।

('हादिसा हूँ मैं' से )

shehr-e-aaseb meiN chaltaa huaa jaadoo roko
sooni galiyoN meiN ye bajte hu.e ghuNghruu roko

in baghooloN ko pakaDne se nahiiN kuchh haasil
ho sakey sahraa-ba-sahraa ram-e-aahoo roko

ulte palDoN se hi taulaa hai zamaana tum ne ...
meri jholee meiN tou duniyaa hai, taraazu roko

sooNghte-sooNghte aa jaay na KHuuNkhaar koi ...
do muhabbat-bhare in jismoN ki khushbu roko ...

hijr ki raah meiN haNs-haNs ke guzarnaa hogaa ...
phool barsaate baDHo, KHoon ke aaNsuu roko ...

kahiiN ban jaaye naa dariyaa ki rawaani toofaaN
'Manjhi' bal khaate hu.e naav ke abruu roko ...

                                                      ~ Devender Manjhi

Tuesday, September 6, 2016

364.  तेरी ज़द से दूर था --ऐसा न था 


तेरी ज़द से दूर था --ऐसा न था
तूने ही मुझको कभी समझा न था

चाहता हूँ भूलना ये सोचकर
जो हुआ, जैसा हुआ, अच्छा न था

तेरी आँखों ने लिखी है दास्ताँ
वर्ना मेरा तो कोई क़िस्सा न था

क्यों है अब दिल में बिछुड़ने का मलाल
जानेवाले क्या तुझे रोका न था

साथ ही यादें भी मर जातीं तेरी
क्या करूँ पल-भर भी मैं तन्हा न था

इसलिए सीमा में थी 'माँझी' नदी
मौज की ठोकर से तट टूटा न था
                            -देवेन्द्र माँझी

('हादिसा हूँ मैं' से )