364. तेरी ज़द से दूर था --ऐसा न था
तेरी ज़द से दूर था --ऐसा न था
तूने ही मुझको कभी समझा न था
चाहता हूँ भूलना ये सोचकर
जो हुआ, जैसा हुआ, अच्छा न था
तेरी आँखों ने लिखी है दास्ताँ
वर्ना मेरा तो कोई क़िस्सा न था
क्यों है अब दिल में बिछुड़ने का मलाल
जानेवाले क्या तुझे रोका न था
साथ ही यादें भी मर जातीं तेरी
क्या करूँ पल-भर भी मैं तन्हा न था
इसलिए सीमा में थी 'माँझी' नदी
मौज की ठोकर से तट टूटा न था
-देवेन्द्र माँझी
('हादिसा हूँ मैं' से )
No comments:
Post a Comment