Sunday, September 4, 2016

362.  दर्द के सपने सुहाने ख़ास देगी 


दर्द  के  सपने  सुहाने  ख़ास  देगी
प्रीत वो मय है जो तुझको प्यास देगी

छीनना होगा तुझे बढ़कर स्वयं ही
भीख में दुनिया न तुझको ग्रास देगी

राम बनकर आने वाले याद रखना
वक़्त की केकैई तुझे बनवास देगी

दूर रह वरना हक़ीक़त की ये ज्वाला
नित नई पीड़ा, नया संत्रास देगी

भूलकर भी लट ज़माने की न छूना
ये बहुत ज़हरीला-सा अहसास देगी

फिर डुबो भी दे तुझे 'माँझी' तो क्या
मौज पहले तो नया एहसास देगी
                               -देवेन्द्र  माँझी

('हादिसा हूँ मैं' से )

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