Thursday, September 8, 2016

366.  पतझड़ भी अपना रंग दिखाती तो है अभी 


पतझड़ भी अपना रंग दिखाती तो है अभी
उड़-उड़के धूल सर पे ये आती तो है अभी

माना शगुफ़्तगी रुख़े-गुल पर नहीं है अब
ख़ुशबू तेरे बदन की लुभाती तो है अभी

आये न आये बादे-सबा इसका ग़म नहीं
कोयल कोई दरख़्त पे गाती तो है अभी

अय दश्ते-नामुराद सलीबों के शहर में
दुनिया हमारा जश्न मनाती तो है अभी

आवाज़ देके 'माँझी' कोई नील की दुल्हन
लहरों के दरम्यान बुलाती तो है अभी
                                     -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. शगुफ़्तगी=प्रफुल्लता, खिले होने का भाव, 2. रुख़े-गुल=फूल का चेहरा अर्थात पुष्प, सुमन, 3. बादे-सबा=पुरवा हवा, ठण्डी व मोहक पवन, 4. दश्ते-नामुराद=असफलताओं का जंगल, 5. नील की दुल्हन=नील नदी।

('हादिसा हूँ मैं' से )

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