366. हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता
हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता
वो चाँद खुलके लबे-बाम क्यों नहीं आता
ज़रा बताओ तो ये आप और तुम क्या है
तेरी ज़बां पे मेरा नाम क्यों नहीं आता
पढ़े तो कैसे पढ़े कोई कोरे काग़ज़ को
लिखाहुआ तेरा पैग़ाम क्यों नहीं आता
वो सह रहे हैं गयी रात आहटों के सितम
वो शख्स घर पे सरे-शाम क्यों नहीं आता
अज़ीब दर्दे-मुहब्बत भी शै है क्या 'माँझी'
दवाएँ लेता हूँ आराम क्यों नहीं आता
-देवेन्द्र माँझी
No comments:
Post a Comment