Thursday, March 31, 2016

313. बारहा जीना पड़ा, मरना पड़ा 


बारहा जीना पड़ा, मरना पड़ा
इस तरह भी तय सफ़र करना पड़ा

वक़्त का मरहम लगाकर दोस्तो
ज़ख़्म अपना ख़ुद हमें भरना पड़ा

साजिशों की गर्म-बाज़ारी न पूछ
मुझको अपने साये से डरना पड़ा

बारहा  ऐसा  हुआ  तेरे  लिए
ज़िन्दगी को दाँव पर धरना पड़ा

बैठकर साहिल पे 'माँझी' याद है
जब समन्दर रेत से भरना पड़ा
                      -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Wednesday, March 30, 2016

312. माना ये कुल जहान तो काला नहीं होगा 


माना ये कुल जहान तो काला नहीं होगा
लेकिन हमारे बाद उजाला नहीं होगा

एहसास जो हुआ नहीं टूटन की टीस का
आँखों में कोई ख़्वाब ही पाला नहीं होगा

बेशक बुतों को पूजिए लेकिन न भूलिए
काफ़िर का बुतक़दे में हवाला नहीं होगा

हो आस्मान साफ़ तो बारिश नहीं होती
तुमने ही ख़ुद को आज सम्हाला नहीं होगा

फँसती ज़रूर मछलियाँ 'माँझी' यक़ीन तो कर
दरिया में तुमने जाल ही डाला नहीं होगा
                                          -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Maanaa ye kul jahaan to kaala nahi'n hoga
Lekin hamaare baad ujaala nahi'n hoga

Ehsaas jo huaa nahi'n TooTan ki Tees ka
Aankho'n mein koii KHwaab hi paala nahi'n hoga

Beshak buto'n ko poojiye lekin na bhooliye
Kaafir ka butqade me'n hawaala nahi'n hoga

Aakaash ho gaye saaf to baarish nahi'n hotee
Tum ne hi KHud ko aaj samhaala nahi'n hoga

Pha'nstee zaruur machhliyaa'n "Manjhi" yaqeen to kar
Dariya me'n tum ne jaal hi Daala nahi'n hoga

- Devender Manjhi

Tuesday, March 29, 2016

311. एक अनहोनी से बच जाएगा ये घर 


एक अनहोनी से बच जाएगा ये घर
इसलिए मैं क़ैद हूँ होंठों के अन्दर

खोल दूँ गर आज अपने होंठ मैं भी
बह्स में पड़ जाएगा सीता-स्वयंवर

अधफटे कपड़ों में, पटरी के किनारे
बैठकर पढ़ते हैं ये सबका मुक़द्दर

छोड़ दी मैंने अगर इक साँस लम्बी
आज ही जल जाएगा सारा समन्दर

दौड़ते हैं किसलिए लहरों पे 'माँझी'
कौन बैठा है नदी के पार जाकर
                       -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से) 

Ek anhonee se bach jaaega ye ghar
Isliye mai'n qaid hu'n ho'ntho'n ke andar

Khol du'n gar aaj apne ho'nth mai'n bhi
Bahas me'n paD jaaegaa seeta-swayamvar

Adh-phate kapDo'n mein, paTree ke kinaare
BaiTH kar paDHte hai'n ye sab ka muqaddar

ChhoD di mai'ne agar ik saa'ns lambee
Aaj hi jal jaaegaa saara samandar

DauRRte hai'n kis liye lahro'n pe "Manjhi"
Kaun baiTHaa hai nadee ke paar jaa kar

- Devender Manjhi



Monday, March 28, 2016

310. ले के ख़त मेरा जो हरकारा गया 


ले के ख़त मेरा जो हरकारा गया
मुफ़्त में मारा वो बेचारा गया

मेरे हिस्से के अँधेरे तू भी जा
अब यहाँ से भोर का तारा गया

जीत के चर्चे थे जिसके हर तरफ़
हारकर सामान वो सारा गया

 सब पड़ा रह जाएगा इक दिन यहाँ
गीत गाता आज बंजारा गया

जब तलक नदियों में था मीठा था जल
क्यों समन्दर में ये हो खारा गया

जब भी मरने की ख़बर 'माँझी' उड़ी
लोग बोले ये कि आवारा गया
                                -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Sunday, March 27, 2016

309. ये नहीं है आप ही मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं 


ये नहीं है आप ही मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं
मेरी अपनी ज़िन्दगी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं

तीरगी से पूछ लेना तुम मेरे घर का पता
इस नगर की रौशनी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं

नोच डालूँगा किसी-दिन उसके चेहरे का नक़ाब
मसनुई वो सादगी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं

कल यही मुझको बताएगी मसीहा दोस्तो
आज माना ये सदी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं

लोग कहते हैं मुझे इस दौर का 'माँझी' मगर
नाव-ओ-पतवार भी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं
                                  -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. तीरगी=अँधेरा, 2. मसनुई=बनावटी।
(मजबूरियाँ मेरी' से)

Friday, March 18, 2016

308. ख़ुद को शीशे में जब देखेगा तो डर जाएगा 


ख़ुद को शीशे में जब देखेगा तो डर जाएगा
घर के आँगन में तू पतझड़-सा बिख़र जाएगा

ख़ाक पकड़ोगे उसे आहटें सुनकर यारो
वक़्त क़ातिल की तरह छुप के निकल जाएगा

इस दोराहे के सिवा और भी राहें हैं बहुत
किसको मालूम है वो शख़्स किधर जाएगा

ऐसा लगता है कि दोशीज़ा-ए-सहरा इक रोज़
ख़ून से कोई तेरी माँग भी भर जाएगा

उसको आना ही नहीं लौट के इस साहिल पर
जब भी 'माँझी' कोई उस पार उतर जाएगा
                                    -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. दोशीज़ा-ए-सहरा=रेगिस्तान की बेटी।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Khud ko shiishe me'n jab dekhegaa to Dar jaa.egaa 
Ghar ke aa'ngan me'n tuu patjhaD saa bikhar jaa.egaa 

Khaak pakDoge usey aahate'n sun kar yaaro 
Waqt qaatil ki tarah chhup ke nikal jaa.egaa 

 Is doraahe ke sivaa aur bhi raahe'n hai'n bahut 
Kisko maaluum hai vo shaKHs kidhar jaa.egaa 

 Aisa lagtaa hai ki dosheezaa-e-sahraa ik roz 
Khoon se koi teri maa'ng bhi bhar jaa.egaa 

Us ko aana hi nahin laut ke is saahil par 
Jab bhi "Manjhi" koi us paar utar jaa.egaa
                               ~ Devender Manjhi 

Dosheezaa-e-sahraa = registaan ki beti

Wednesday, March 16, 2016

307. लड़खड़ाती ज़िन्दगी है क्या करूँ तू ही बता 


लड़खड़ाती ज़िन्दगी है क्या करूँ तू ही बता
मुझपे अब मुश्किल बनी है क्या करूँ तू ही बता

टीस के इन तम्बुओं में ज़र्द चेहरे हो गए
ख़ौफ़ की आँधी चली है क्या करूँ तू ही बता

पढ़ के जिसको हर किसी की आँख से आँसू गिरे
वो कहानी अपनी ही है क्या करूँ तू ही बता

जिसपे है विश्वास बरसेगी कि वो बदली यहाँ
आँधियों में वो घिरी है क्या करूँ तू ही बता

थामकर पतवार 'माँझी' नाव खींचे किस तरह
हाथ में जब हथकड़ी है क्या करूँ तू ही बता
                                      -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी'

Tuesday, March 15, 2016

306. जिसने अपना रूप निहारा शीशे में 


जिसने अपना रूप निहारा शीशे में
उसने तेरा नाम पुकारा शीशे में

तुझसे ही मिलकर वो कल खोया है
फिरता था जो इक आवारा शीशे में

दुनिया जिसका जश्न मनाती है यारो
रोता है क़िस्मत का मारा शीशे में

मैंने कितनी दहलीज़ों पर पाँव रखे
छाया है जबसे अँधियारा शीशे में

इसने तो प्रतिरूप उतारा तेरा ही
झुँझलाकर क्यों पत्थर मारा शीशे में

'माँझी' उलझन में उलझा है देखो तो
ढूँढ़े है तट का नज़्ज़ारा शीशे में
                        -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Jis ne apna roop nihaara shiishe me'n 
Usne tera naam pukaara shiishe me'n 

Tujh se hi milkar vo kal khoyaa hai 
Phirtaa tha jo ik aawaara shiishe me'n 

Duniya jis ka jashn manaati hai yaaro 
Rotaa hai qismat ka maara shiishe me'n 

Maine kitnii dehleezo'n par paa'NV rakhe 
Chhaayaa hai jab se a'ndhiyaara shiishe me'n 

Is ne tou pratiroop utaara tera hi 
Jhu'njhlaakar kyo'n patthar maara shiishe me'n 

"Manjhi" uljhan me'n uljhaa hai dekho tou 
DHuu'nDHe hai taT ka nazzaara shiishe me'n
                                    ~ Devender Manjhi

Monday, March 14, 2016

305. कैसे कह दूँ हाथ में मेरे कोई शीशा नहीं 


कैसे कह दूँ हाथ में मेरे कोई शीशा नहीं
जो नज़र आता है इसमें चेहरा वो मेरा नहीं

कल खुली छोड़ीं थी मैंने अपने घर की खिड़कियाँ
एक भी झोंका हवा का इस तरफ़ गुज़रा नहीं

आई थीं इस शहर में गर आँधियाँ तब्दील की
ज़र्द पत्ता शाख से क्यों एक भी टूटा नहीं

जाने किस दीवानगी में लिख गया आख़िर में ये
देखता हूँ तेरी मूरत जब नशा होता नहीं

लोग तट पर आके बोले ये है 'माँझी' का कमाल
देखिये उसको मगर एहसास तक इसका नहीं
                                     -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी से)
Kaise kah duu'n haath me'n mere koi sheesha nahi'n 
Jo nazar aata hai isme'n chehraa vo mera nahi'n 

Kal khulii chhoDee'n thi maine apne ghar ki khiDkiyaa'n 
Ek bhi jkho'nkaa hawaa ka is taraf guzraa nahi'n 


Aayi thii'n is shahar me'n gar aa'ndhiyaa'n tabdeel ki 
Zard pattaa shaakh se kyo'n ek bhi TooTaa nahi'n 

Jaane kis deewaangi me'n likh gayaa aaKHir me'n ye 
Dekhtaa hu'n teri murat jab nashaa hota nahi'n 


Log taT par aa ke bole ye hai "Manjhi" ka kamaal 
Dekhiye us ko magar ehsaas tak iskaa nahi'n 
                                                         ~ Devender Manjhi

Tuesday, March 1, 2016

304. एक फ़िक़रा जो उछाला आज फिर 


एक फ़िक़रा जो उछाला आज फिर
उलझनों में ख़ुद को डाला आज फिर

क्या इसे हो जाए तुझको देखकर
दिल को मुश्किल से सम्हाला आज फिर

वो दिया लेने मेरे घर आयेंगे
काश! मिट जाए उजाला आज फिर

वो मेरा हमशक्ल होगा, मैं नहीं
जिसको महफ़िल से निकाला आज फिर

लहर है या जाल 'माँझी' तू बता
पड़ गया है किससे पाला आज फिर
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303. अब ढह गई वो छत दीवारो-दर नहीं रहे


अब ढह गई वो छत दीवारो-दर नहीं रहे
क्या-क्या मेरे मकान के मंज़र नहीं रहे

आकाश की विशालता कुछ भी बखानिये
पिंजरे में क़ैद पंछी के अब पर नहीं रहे

जब से हुआ है ज़िन्दगी से उनका सामना
तब से वो रात-रात भर भी घर नहीं रहे

फिर भी हमारा क़त्ल वो क़िस्तों में कर गए
हालाँकि उनके हाथ में ख़ंजर नहीं रहे

अक्सर इसी का 'माँझी' को होता रहा मलाल
पहले-सी वो मस्ती लिए सागर नहीं रहे