310. ले के ख़त मेरा जो हरकारा गया
ले के ख़त मेरा जो हरकारा गया
मुफ़्त में मारा वो बेचारा गया
मेरे हिस्से के अँधेरे तू भी जा
अब यहाँ से भोर का तारा गया
जीत के चर्चे थे जिसके हर तरफ़
हारकर सामान वो सारा गया
सब पड़ा रह जाएगा इक दिन यहाँ
गीत गाता आज बंजारा गया
जब तलक नदियों में था मीठा था जल
क्यों समन्दर में ये हो खारा गया
जब भी मरने की ख़बर 'माँझी' उड़ी
लोग बोले ये कि आवारा गया
-देवेन्द्र माँझी
(मजबूरियाँ मेरी' से)
No comments:
Post a Comment