Tuesday, March 1, 2016

304. एक फ़िक़रा जो उछाला आज फिर 


एक फ़िक़रा जो उछाला आज फिर
उलझनों में ख़ुद को डाला आज फिर

क्या इसे हो जाए तुझको देखकर
दिल को मुश्किल से सम्हाला आज फिर

वो दिया लेने मेरे घर आयेंगे
काश! मिट जाए उजाला आज फिर

वो मेरा हमशक्ल होगा, मैं नहीं
जिसको महफ़िल से निकाला आज फिर

लहर है या जाल 'माँझी' तू बता
पड़ गया है किससे पाला आज फिर
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