309. ये नहीं है आप ही मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं
ये नहीं है आप ही मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं
मेरी अपनी ज़िन्दगी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं
तीरगी से पूछ लेना तुम मेरे घर का पता
इस नगर की रौशनी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं
नोच डालूँगा किसी-दिन उसके चेहरे का नक़ाब
मसनुई वो सादगी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं
कल यही मुझको बताएगी मसीहा दोस्तो
आज माना ये सदी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं
लोग कहते हैं मुझे इस दौर का 'माँझी' मगर
नाव-ओ-पतवार भी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. तीरगी=अँधेरा, 2. मसनुई=बनावटी।
(मजबूरियाँ मेरी' से)
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