Thursday, March 31, 2016

313. बारहा जीना पड़ा, मरना पड़ा 


बारहा जीना पड़ा, मरना पड़ा
इस तरह भी तय सफ़र करना पड़ा

वक़्त का मरहम लगाकर दोस्तो
ज़ख़्म अपना ख़ुद हमें भरना पड़ा

साजिशों की गर्म-बाज़ारी न पूछ
मुझको अपने साये से डरना पड़ा

बारहा  ऐसा  हुआ  तेरे  लिए
ज़िन्दगी को दाँव पर धरना पड़ा

बैठकर साहिल पे 'माँझी' याद है
जब समन्दर रेत से भरना पड़ा
                      -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

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