307. लड़खड़ाती ज़िन्दगी है क्या करूँ तू ही बता
लड़खड़ाती ज़िन्दगी है क्या करूँ तू ही बता
मुझपे अब मुश्किल बनी है क्या करूँ तू ही बता
टीस के इन तम्बुओं में ज़र्द चेहरे हो गए
ख़ौफ़ की आँधी चली है क्या करूँ तू ही बता
पढ़ के जिसको हर किसी की आँख से आँसू गिरे
वो कहानी अपनी ही है क्या करूँ तू ही बता
जिसपे है विश्वास बरसेगी कि वो बदली यहाँ
आँधियों में वो घिरी है क्या करूँ तू ही बता
थामकर पतवार 'माँझी' नाव खींचे किस तरह
हाथ में जब हथकड़ी है क्या करूँ तू ही बता
-देवेन्द्र माँझी
(मजबूरियाँ मेरी'
No comments:
Post a Comment