Tuesday, March 1, 2016

303. अब ढह गई वो छत दीवारो-दर नहीं रहे


अब ढह गई वो छत दीवारो-दर नहीं रहे
क्या-क्या मेरे मकान के मंज़र नहीं रहे

आकाश की विशालता कुछ भी बखानिये
पिंजरे में क़ैद पंछी के अब पर नहीं रहे

जब से हुआ है ज़िन्दगी से उनका सामना
तब से वो रात-रात भर भी घर नहीं रहे

फिर भी हमारा क़त्ल वो क़िस्तों में कर गए
हालाँकि उनके हाथ में ख़ंजर नहीं रहे

अक्सर इसी का 'माँझी' को होता रहा मलाल
पहले-सी वो मस्ती लिए सागर नहीं रहे

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