Tuesday, October 18, 2016

367.  हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता


हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता
सामने मंज़िल के धोका खा गए

ग़ैर पर नज़रे-इनायत देखकर
हम तेरी मह्फ़िल से उठकर आ गए

किसलिए ये ग़म की बदली छा गयी
फूल क्यों बादे-सबा कुम्हला गए

बेनियाज़ी का हमें कुछ डर नहीं
लोग अब तो तेरी आदत पा गए

उनसे मिलना भी क़यामत हो गया
सैकड़ों इल्ज़ाम सर पर आ गए

जा के किससे हाले-दिल 'माँझी' कहे
ज़ख्म सीने के वो सब दिखला गए
--देवेन्द्र माँझी


हादिसा हूँ मैं' से

Monday, October 10, 2016

366. हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता



हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता
वो चाँद खुलके लबे-बाम क्यों नहीं आता

ज़रा बताओ तो ये आप और तुम क्या है
तेरी ज़बां पे मेरा नाम क्यों नहीं आता

पढ़े तो कैसे पढ़े कोई कोरे काग़ज़ को
लिखाहुआ तेरा पैग़ाम क्यों नहीं आता

वो सह रहे हैं गयी रात आहटों के सितम
वो शख्स घर पे सरे-शाम क्यों नहीं आता

अज़ीब दर्दे-मुहब्बत भी शै है क्या 'माँझी'
दवाएँ लेता हूँ आराम क्यों नहीं आता
-देवेन्द्र माँझी