Wednesday, November 16, 2016

368. मुझको जब मुश्किल में जीना आ गया 


मुझको जब मुश्किल में जीना आ गया
दुश्मनों को भी पसीना आ गया

अब न ढूँढेंगे रफूगर शहर में
ऐ मुहब्बत चाक सीना आ गया

साक़िया ये सागरो-मीना उठा
मुझको पीने का क़रीना आ गया

मुझको तो इक बूँद पानी है गरां
तुझको कैसे ज़हर पीना आ गया

आँख ही उस वक़्त 'माँझी' की खुली
जब किनारे पर सफ़ीना आ गया
                       --देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Tuesday, October 18, 2016

367.  हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता


हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता
सामने मंज़िल के धोका खा गए

ग़ैर पर नज़रे-इनायत देखकर
हम तेरी मह्फ़िल से उठकर आ गए

किसलिए ये ग़म की बदली छा गयी
फूल क्यों बादे-सबा कुम्हला गए

बेनियाज़ी का हमें कुछ डर नहीं
लोग अब तो तेरी आदत पा गए

उनसे मिलना भी क़यामत हो गया
सैकड़ों इल्ज़ाम सर पर आ गए

जा के किससे हाले-दिल 'माँझी' कहे
ज़ख्म सीने के वो सब दिखला गए
--देवेन्द्र माँझी


हादिसा हूँ मैं' से

Monday, October 10, 2016

366. हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता



हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता
वो चाँद खुलके लबे-बाम क्यों नहीं आता

ज़रा बताओ तो ये आप और तुम क्या है
तेरी ज़बां पे मेरा नाम क्यों नहीं आता

पढ़े तो कैसे पढ़े कोई कोरे काग़ज़ को
लिखाहुआ तेरा पैग़ाम क्यों नहीं आता

वो सह रहे हैं गयी रात आहटों के सितम
वो शख्स घर पे सरे-शाम क्यों नहीं आता

अज़ीब दर्दे-मुहब्बत भी शै है क्या 'माँझी'
दवाएँ लेता हूँ आराम क्यों नहीं आता
-देवेन्द्र माँझी

Thursday, September 8, 2016

366.  पतझड़ भी अपना रंग दिखाती तो है अभी 


पतझड़ भी अपना रंग दिखाती तो है अभी
उड़-उड़के धूल सर पे ये आती तो है अभी

माना शगुफ़्तगी रुख़े-गुल पर नहीं है अब
ख़ुशबू तेरे बदन की लुभाती तो है अभी

आये न आये बादे-सबा इसका ग़म नहीं
कोयल कोई दरख़्त पे गाती तो है अभी

अय दश्ते-नामुराद सलीबों के शहर में
दुनिया हमारा जश्न मनाती तो है अभी

आवाज़ देके 'माँझी' कोई नील की दुल्हन
लहरों के दरम्यान बुलाती तो है अभी
                                     -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. शगुफ़्तगी=प्रफुल्लता, खिले होने का भाव, 2. रुख़े-गुल=फूल का चेहरा अर्थात पुष्प, सुमन, 3. बादे-सबा=पुरवा हवा, ठण्डी व मोहक पवन, 4. दश्ते-नामुराद=असफलताओं का जंगल, 5. नील की दुल्हन=नील नदी।

('हादिसा हूँ मैं' से )

Wednesday, September 7, 2016

365.  शहरे-आसेब में चलता हुआ जादू रोको


शहरे-आसेब में चलता हुआ जादू रोको
सूनी गलियों में ये बजते हुए घुँघरू रोको

इन बगूलों को पकड़ने से नहीं कुछ हासिल
हो सके सहरा-ब-सहरा रमे-आहू रोको

उलटे पलड़ों से ही तौला है ज़माना तुमने
मेरी झोली में तो दुनिया है तराज़ू रोको

सूंघते-सूंघते आ जाए न खूंखार कोई
दो मुहब्बत-भरे इन जिस्मों की खुशबू रोको

हिज्र की राह में हँस-हँस के गुज़रना होगा
फूल बरसाते बढ़ो, ख़ून के आँसू रोको

कहीं बन जाए ना दरिया की रवानी तूफाँ
'माँझी' बल खाते हुए नाव के अबरू रोको
                                    -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. शहरे-आसेब=भूतों का नगर, 2. सहरा-ब-सहरा=जंगल-जंगल, रेगिस्तान में, 3. रमे-आहू=हिरनी की चाल, 4. हिज्र=विरह।

('हादिसा हूँ मैं' से )

shehr-e-aaseb meiN chaltaa huaa jaadoo roko
sooni galiyoN meiN ye bajte hu.e ghuNghruu roko

in baghooloN ko pakaDne se nahiiN kuchh haasil
ho sakey sahraa-ba-sahraa ram-e-aahoo roko

ulte palDoN se hi taulaa hai zamaana tum ne ...
meri jholee meiN tou duniyaa hai, taraazu roko

sooNghte-sooNghte aa jaay na KHuuNkhaar koi ...
do muhabbat-bhare in jismoN ki khushbu roko ...

hijr ki raah meiN haNs-haNs ke guzarnaa hogaa ...
phool barsaate baDHo, KHoon ke aaNsuu roko ...

kahiiN ban jaaye naa dariyaa ki rawaani toofaaN
'Manjhi' bal khaate hu.e naav ke abruu roko ...

                                                      ~ Devender Manjhi

Tuesday, September 6, 2016

364.  तेरी ज़द से दूर था --ऐसा न था 


तेरी ज़द से दूर था --ऐसा न था
तूने ही मुझको कभी समझा न था

चाहता हूँ भूलना ये सोचकर
जो हुआ, जैसा हुआ, अच्छा न था

तेरी आँखों ने लिखी है दास्ताँ
वर्ना मेरा तो कोई क़िस्सा न था

क्यों है अब दिल में बिछुड़ने का मलाल
जानेवाले क्या तुझे रोका न था

साथ ही यादें भी मर जातीं तेरी
क्या करूँ पल-भर भी मैं तन्हा न था

इसलिए सीमा में थी 'माँझी' नदी
मौज की ठोकर से तट टूटा न था
                            -देवेन्द्र माँझी

('हादिसा हूँ मैं' से )

363.  पछतावे की ओढ़ के चादर अपने सर को धुनते हैं 


पछतावे की ओढ़ के चादर अपने सर को धुनते हैं
छोड़ हक़ीक़त का दामन जो केवल सपने बुनते हैं

फूल बहुत भाते हैं हमको लेकिन रास नहीं आते
हम बगिया में जाकर अक्सर आँख से काँटे चुनते हैं

आस का पेड़ खड़ा है सूखा अब भी मन के आँगन में
'मौसम ने करवट बदली है' बात ये हम भी सुनते हैं

सोच के ये ही बाहर आया मैं ख़ुद अपने आँगन से
सोचों को घुन लगता है जब अन्दर-अन्दर घुनते हैं

देख रहा है सुबह से 'माँझी' तट पर बैठा मंज़र ये
कश्ती की ख़ातिर ही तूफ़ां जाल लहर का बुनते हैं
                                                  -देवेन्द्र माँझी


('हादिसा हूँ मैं' से )

pachhtaave ki oDH ke chaadar apne sar ko dhunte haiN ...
chhoRR haqeeqat ka daaman jo keval sapne bunte haiN ...

phool bahut bhaate haiN ham ko lekin raas nahiiN aate ...
ham bagiya meiN jaakar aksar aaNkh se kaaNte chunte haiN ...

aas ka peD khaDaa hai sookhaa ab bhi man ke aaNgan meiN ...
"mausam ne karvaT badli hai" baat ye ham bhi sun.te haiN ...

soch ke ye hi baahar aaya maiN KHud apne aaNgan se ...
sochoN ko ghun lagtaa hai jab andar-andar ghun.te haiN

dekh rahaa hai sub'h se 'Manjhi' taT par baiTHaa manzar ye ...
kashti ki KHaatir hi toofaaN jaal lahar ka bun.te haiN

                                                                     ~ Devender Manjhi

Sunday, September 4, 2016

362.  दर्द के सपने सुहाने ख़ास देगी 


दर्द  के  सपने  सुहाने  ख़ास  देगी
प्रीत वो मय है जो तुझको प्यास देगी

छीनना होगा तुझे बढ़कर स्वयं ही
भीख में दुनिया न तुझको ग्रास देगी

राम बनकर आने वाले याद रखना
वक़्त की केकैई तुझे बनवास देगी

दूर रह वरना हक़ीक़त की ये ज्वाला
नित नई पीड़ा, नया संत्रास देगी

भूलकर भी लट ज़माने की न छूना
ये बहुत ज़हरीला-सा अहसास देगी

फिर डुबो भी दे तुझे 'माँझी' तो क्या
मौज पहले तो नया एहसास देगी
                               -देवेन्द्र  माँझी

('हादिसा हूँ मैं' से )

Thursday, September 1, 2016

361.  कहीं यादें, कहीं शिकवे-शिकायत और गिले होंगे 


कहीं यादें, कहीं शिकवे-शिकायत और गिले होंगे
जो पीछे छोड़ जाएँगे वो लम्बे सिलसिले होंगे

यहाँ बस्ती पै मँडराती हैं अक्सर ख़ौफ़ की बिजली
जहाँ जाकर छुपेंगे हम वो साज़िश के क़िले होंगे

भला क्यों आनकर बैठें वो बनफूलों की पाँतों में
वो कुछ तो ख़ास होंगे ही जो गमलों में खिले होंगे

यहाँ जो गर्द की सूरत नई अफ़वाह-सी उड़ती है
यहाँ से जो भी गुज़रेंगे वो किसके क़ाफ़िले होंगे

वहाँ जाकर ही टकराएगी 'माँझी ' सोच की कश्ती
जहाँ धरती-गगन आपस में दोनों ही मिले होंगे
                                        --देवेन्द्र माँझी

('हादिसा हूँ मैं' से )

Wednesday, August 31, 2016

360.  दिल के आँगन में तेरी धूप उतर आती है 


दिल के आँगन में तेरी धूप उतर आती है
सर्द मौसम में मेरे जिस्म को गरमाती है

मेरी तौबा से तो होंगे नहीं मैख़ाने बन्द
मैं ही क्या हूँ तेरी दुनिया ही ख़राबाती है

है कोई और भी इस शहर में दीवाना कहीं
शबे-आख़िर ये जो रोने की सदा आती है

भूल जाता हूँ मुहब्बत के गिले-शिकवे तमाम
ज़ेह्न में जब कोई तस्वीर उभर आती है

हुस्न वालों की ये दुनिया ही अजब है 'माँझी'
बात करता हूँ तो हर बात पे शरमाती है
                                  --देवेन्द्र माँझी

('हादिसा हूँ मैं' से )

dil ke aaNgan meiN teri dhoop utar aati hai ...
sard mausam meiN mere jism ko garmaati hai ...

meri taubaa se tou hoNge nahiiN maikhane baNd
maiN hi kyaa huuN, teri duniya hi KHaraabaati hai ...

hai koi aur bhi is shehar meiN deewaana kahiiN ...
shab-e-aaKHir ye jo roney ki sadaa aati hai ...

bhool jaata huuN muhabbat ke gile -shikwe tamaam ...
zehn meiN jab koi tasveer ubhar aati hai ...

husn waaaloN ki ye duniya hi ajab hai 'Manjhi' ...
baat kartaa huN tou har baat pe sharmaati hai ...

                                                 ~ Devender Manjhi

Tuesday, August 30, 2016

359. तीरगी में उजास! पागल है ?


तीरगी में उजास! पागल है?
उनसे मिलने की आस! पागल है?

नागफनियों की छाँव में ख़ुशबू
और गुलाबों में बास! पागल है?

जिसकी गिनती है नौ न तेरह में
उसको कहता है ख़ास! पागल है?

एक दीपक बुझा, नगर सारा
हो गया बदहवास! पागल है?

देखकर मौज की अदा 'माँझी'
आज है जो उदास, पागल है?
                --देवेन्द्र माँझी

('हादिसा हूँ मैं' से)

Monday, August 29, 2016

358. इतना घोर अँधेरा क्यों है 


इतना घोर अँधेरा क्यों है
उजड़ा दिन का डेरा क्यों है

डर लगता है सन्नाटों में
तन्हाई का फेरा क्यों है

साँप बसे हैं आस्तीन में
व्याकुल आज सपेरा क्यों है

जिसने लूटी बस्ती सारी
मुझमें वही लुटेरा क्यों है

काट न पाए  'माँझी ' जिसको
लहरों का वो घेरा क्यों है
                 ---देवेन्द्र माँझी

('हादिसा हूँ मैं ' से)

Sunday, August 28, 2016

357. सम्बन्धों पर आरी रख ले 


सम्बन्धों पर आरी रख ले
मान ले, बात हमारी रख ले

टस  से मस कर पाए न कोई
दिल पर पत्थर भारी रख ले

ये भी ख़ुश हों, वो भी ख़ुश हों
ऐसी दुनियादारी रख ले

मस्त पवन की तरह चला चल
आपाधापी सारी रख ले

सुलगें ज़ेह्न सभी के 'माँझी '
सोचों की चिंगारी रख ले
                  -देवेन्द्र माँझी


('हादिसा हूँ मैं ' से )

sambandhoN par aaree rakh le
maan le, baat hamaaree rakh le

Tas se mas kar paaye na koii
dil par patthar bharii rakh le

ye bhi khush hoN, vo bhi khush hoN
aisii duniyaa.daaree rakh le

mast pawan ki tarah chalaa chal
aapaa-dhaapee saarii rakh le

sulgeN zehn sabhi ke "Manjhi"
sochoN ki chingaarii rakh le

Thursday, July 7, 2016

356. इतना शोर मचाकर मुझमें 


इतना शोर मचाकर मुझमें
झाँका किसने आकर मुझमें

खोया कौन भरी महफ़िल में
अपना अक़्स छुपाकर मुझमें

मस्त हुआ वो घूम रहा है
शर्म-हया सिमटाकर मुझमें

आँख समन्दर कर देते हैं
याद के बादल छाकर मुझमें

उतरेगा लहरों पर 'माँझी'
फिर तूफ़ान उठाकर मुझमें
                     देवेन्द्र माँझी

Monday, July 4, 2016

355. मैं महज इस वास्ते ही आऊँगा -- कहता था वो 


मैं महज इस वास्ते ही आऊँगा -- कहता था वो
आईनों को आईना दिखलाऊँगा -- कहता था वो

हदिसों की भीड़ में गुम आज हूँ तो क्या हुआ
एक दिन सबका पता बन जाऊँगा -- कहता था वो

ये नगर जब धुंध में लिपटेगा तब सच मानिए
धूप की बनकर रिदा मैं छाऊंगा -- कहता था वो

जाते दम भी वो तसल्ली दे के यूँ बहला गया
आऊँगा इक बार मैं फिर आऊँगा -- कहता था वो

बंद है तो ठीक है, हो तुम भी ख़ुश और मैं भी ख़ुश
खोलकर मुट्ठी तुम्हें उलझाऊँगा -- कहता था वो

छोड़कर काग़ज़ की कश्ती जाने दो बच्चों को तुम
मैं हूँ 'माँझी' पार मैं ले जाऊँगा -- कहता था वो
                                        -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. रिदा=चादर।

(हादिसा हूँ मैं' से)

MaiN mahaj is waastey hi aauNgaa -- kahtaa thaa vo ...
AaiinoN ko aaiinaa dikhlaauNgaa -- kahtaa thaa vo ...

HaadisoN kii bheeD meiN gum aaj hooN tou kyaa huaa ...
Ek din sab ka pataa ban jaauNgaa -- kahtaa thaa vo ...

Ye nagar jab DHuNDH meiN liptegaa tab sach maaniye ...
Dhoop ki ban kar ridaa maiN chhaauNgaa -- kahtaa thaa vo ...

Jaate dam bhi vo tasallee de ke yuuN bahlaa gayaa ...
AauNgaa ik baar maiN phir aauNgaa -- kahtaa thaa vo

BaNd hai tou THeek hai, ho tum bhi KHush aur maiN bhi KHush ...
Khol kar mutTHee tumheiN uljhaauNgaa -- kahtaa thaa vo ...

ChhoRRkar Kaaghaz ki kashtee jaane do bachchoN ko tum ...
MaiN hooN 'Manjhi' paar maiN le jaauNgaa -- kahtaa thaa vo ...

                                                                   ~ Devender Manjhi

Sunday, July 3, 2016

354. मुझको पास बुलाती क्यों है 


मुझको पास बुलाती क्यों है
मंज़िल मुझे रिझाती क्यों है

धूप की शै पर ये परछाई
मुझसे आगे जाती क्यों है

आज हवा तेरी खुशबू ले
मेरे घर में आती क्यों है

ख़्वाबों की चिंगारी आकर
मेरी पलक जलाती क्यों है

'माँझी' की कश्ती सागर में
आज क़यामत ढाती क्यों है
                   देवेन्द्र माँझी

353. हँसने का मन लौटा भी दो 


हँसने का मन लौटा भी दो
हाँ, वो बचपन लौटा भी दो

जिसमें उभरे अक्स प्यार का
ऐसा दरपन लौटा भी दो

शहर की ओ सपनीली गालिओ!
निर्धन का धन लौटा भी दो

ये कहकर माँगूँ मैं तुमको
मेरा जीवन लौटा भी दो

सूनापन संन्यासी होगा
याद का चन्दन लौटा भी दो
                  -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

HaNsne ka man lautaa bhi do
HaaN, vo bachpan lautaa bhi do

Jis meiN ubh.re aks pyaar kaa
Aisaa darpan lautaa bhi do

Shahar ki o sapniilee galiyoN
Nirdhan ka dhan lautaa bhi do

Ye kah kar maaNgooN maiN tum ko
Meraa jeevan lautaa bhi do

Soonaapan sanyaasii hogaa
Yaad ka chandan lautaa bhi do

               ~ Devender Manjhi

Thursday, June 30, 2016

352. तेरा राह बताना देखा 


तेरा राह बताना देखा
मंज़िल से भटकाना देखा

देह चीरकर अँधियारे की
सूरज का इठलाना देखा

हर युग के चौराहे पर ही
तेरा आना-जाना देखा

सब की चाहत में रहता जो
ख़ुद से ही अंजाना देखा

बीच भँवर में मैंने 'माँझी'
मौजों का बल खाना देखा
                -देवेन्द्र माँझी

Teraa raah bataana dekhaa
Manzil se bhaT.kaana dekhaa

Deh cheerkar andhiyaare kee
Sooraj ka iTHlaana dekhaa

Har yug ke chauraahe par hi
Tera aanaa-jaanaa dekhaa

Sab ki chaahat meiN rahtaa jo
KHud se hi anjaanaa dekhaa

Beech bhaNwar meiN maiN'ne 'Manjhi'
MaujoN ka bal khaana dekha

                          ~ Devender Manjhi

Wednesday, June 29, 2016

351. क्या बताऊँ दोस्तो कैसा हूँ मैं 


क्या बताऊँ दोस्तो कैसा हूँ मैं
रूह के ज़ख़्मों से शर्मिन्दा हूँ मैं

एक अर्से से यहाँ ठहरा हूँ मैं
शुक्रिया अय दोस्तों ! चलता हूँ मैं

आईने के साथ भी तन्हा हूँ मैं
चलती-फिरती लाश-सा रहता हूँ मैं

तुम हो चेहरे और मुखौटे वक़्त के
टूटकर बिखरा हुआ शीशा हूँ मैं

ले चलो 'माँझी' मुझे दरियाओं में
हर समय साहिल पे ये कहता हूँ मैं
                       -देवेन्द्र माँझी

Kyaa bataauuN dosto kaisaa hooN maiN ...
Rooh ke zaKHmoN se sarmindaa hooN maiN ...

Ek arse se yahaaN THahraa hooN maiN ...
Shukriya aiy dostoN ! Chaltaa hooN maiN ...

Aaiine ke saath bhi tanhaa hooN maiN ...
Chaltee-phirtee laash sa rahtaa hooN maiN ...

Tum ho chehre aur mukhauTe waqt ke ...
TooT kar bikhraa huaa shiishaa hooN maiN ...

Le chalo 'Manjhi' mujhe dariyaaoN meiN ...
Har samay saahil pe ye kahtaa hooN maiN ...

                                          ~ Devender Manjhi

Sunday, June 26, 2016

350. टूटे हुए दिलों के हवाले मिले बहुत 


टूटे हुए दिलों के हवाले मिले बहुत
इन रास्तों में अन्धे उजाले मिले बहुत

तन्हा गुजरने वालों में तन्हा नहीं रहा
तेरी गली के चाहने वाले मिले बहुत

मैं ख़ुशनसीब था  खण्डर से निकल गया
ख़ूंख़ार मकड़ियों के भी जाले मिले बहुत

उजले लिबास देखने में ही भले लगे
किरदार उनके शहर में काले मिले बहुत

'माँझी' की नाव झील से वाबस्ता हो गई
सहरा में और भी नदी-नाले मिले बहुत
                              -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Toote hue dilon ke havaale mile bahut ...
In raaston mein andhe ujaale mile bahut ...

Tanhaa guzarne waaloN meiN tanhaa nahiiN rahaa ...
Teri galii ke chaahne waale mile bahut ...

MaiN KHushnaseeb thaa khaNDar se nikal gayaa ...
KhooNkhaar makDiyoN ke bhi jaale mile bahut ...

Ujle libaas dekhne mein hi bhale lagey ...
Kirdaar un ke shahar mein kaaley mile bahut ...

'Manjhi' ki naav jheel se vaabastaa ho gayee ...
Sahraa mein aur bhi nadi-naale mile bahut ...

                                      - Devender Manjhi

Monday, June 20, 2016

349.  आपका इस ओर से जब रास्ता होता गया 


आपका इस ओर से जब रास्ता होता गया
साँस लेना जुर्म जीना हादिसा होता गया

ये नगर बस दाद देता है मेरे अशआर पर
कौन जाने क्या था मैं और क्या से क्या होता गया

चिलचिलाती धूप आकर जब पड़ी सर पर मेरे
एक पैकर छाँव का मुझसे अता होता गया

आग की लपटें लिये दुनिया को झुलसाता रहा
पास आकर मेरे क्यों वो बर्फ़ सा होता गया

नाव 'माँझी' जब बढ़ी दरियाओं की गहराई में
तेज़ तूफ़ानों से मेरा सामना होता रहा
                                 -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. अशआर=ग़ज़ल  शेर का बहुवचन, 2. अता=प्रदान अर्थात
जब धूप मेरे सर पर पड़ी तो मैं छाँव देता रहा।

(हादिसा हूँ मैं'से)

Sunday, June 19, 2016

348. बाप की ख़्वाहिश है ये उसका पिसर ज़िन्दा रहे 


बाप की ख़्वाहिश है ये उसका पिसर ज़िन्दा रहे
मैं रहूँ या न रहूँ, मेरा हुनर ज़िन्दा रहे

कौन छोड़ेगा भला फूलों को फिर यूँ शाख़ पर
जब तलक भी हो सके काँटों का डर ज़िन्दा रहे

बात फिर पैदा नहीं होती कहीं तकलीफ़ की
इन ख़यालों में अगर सच्चा समर ज़िन्दा रहे

कौन जाने वक़्त कब करवट ले कैसी इसलिए
हो भी जाए दुश्मनी तो इक अगर ज़िन्दा रहे
                                         -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)
Baap ki KHwaahish hai ye uskaa pisar zindaa rahe
MaiN rahooN ya na rahooN, mera hunar zindaa rahe

Kaun chhoDegaa bhalaa phooloN ko phir yuuN shaaKh par
Jab talak bhi ho sake kaaNtoN ka Dar zinda rahe

Baat phir paidaa nahiiN hoti kahiiN takleef kii
In KHayaaloN meiN agar sachchaa samar zinda rahe

Kaun jaane waqt kab karvat le kaisee isliye
Ho bhi jaaye dushmani to iker agar zinda rahe

                                    ~ Decender Manjhi

Thursday, June 16, 2016

347. अफ़वाहों की तेज़ हवा में सच का दीपक बुझता है 


अफ़वाहों की तेज़ हवा में सच का दीपक बुझता है
आवारा बादल के पीछे जैसे सूरज छिपता है

देखो वो दीवाना है या पागल है कुछ तो है वो
घुप्प अँधेरे में बैठा जो दिन की पाती लिखता है

कौन ख़रीदेगा अब इनको, क़ीमत इनकी है भी क्या
जिस्म और ईमान सभी कुछ गली-गली में बिकता है

नाव और पतवार से रिश्ता तर्क किया है उसने अब
तट पर बैठा-बैठा 'माँझी' लहरों को ही गिनता है
                                        -देवेन्द्र माँझी

Tuesday, June 14, 2016

346. धूप तेरी याद की जब भी ढली अय हमनवा 


धूप तेरी याद की जब भी ढली अय हमनवा
तब किसी साये ने कर ली ख़ुदकुशी अय हमनवा

शोर है सारे नगर में बस इसी इक बात का
दुश्मनों से कर ली हमने दोस्ती अय हमनवा

मैंने तो कुछ भी नहीं उससे कहा ईमान से
बात ये बेबात में ही चल पड़ी अय हमनवा

कौन जाने कल इसे बतला गया क्या आईना
ख़ुद-ब-ख़ुद शरमा गई ये ज़िन्दगी अय हमनवा

छोड़कर साहिल को 'माँझी' दूर सागर में गया
जब कभी लहरों पे ये कश्ती चली अय हमनवा
                                     -देवेन्द्र माँझी

Monday, June 13, 2016

345. अब  हमसे बतियाये कौन ?


अब हमसे बतियाये कौन ?
अपना वक़्त गँवाये कौन ?

आँगन में दहशत फ़ैली
सन्नाटा सरकाये कौन ?

बुत मन्दिर में व्याकुल हैं
दीपक लेकर आये कौन ?

बात-बात पर रोता है
इस दिल को समझाये कौन ?

दिन में ही सब होता है
अपनी रात जगाये कौन ?

जलती हैं लहरों की आँख
'माँझी' बनकर आये कौन ?
                 -देवेन्द्र माँझी
(हादिसा हूँ मैं' से)

Ab hamse batiyaa.ye kaun ?
Apna waqt gaNvaaye kaun ?

AaNgan meiN dehshat phailee
SannaaTaa sarkaaye kaun ?

But mandir meiN vyaakul haiN
Deepak lekar aaye kaun ?

Baat-baat par rotaa hai
Is dil ko samjhaaye kaun ?

Din meiN hi sab hotaa hai
Apnii raat jagaaye kaun ?

Jaltee haiN lehroN kii aaNkh
"Manjhi" ban kar aaye kaun ?

               ~ Devender Manjhi

Sunday, June 12, 2016

344. उसकी तस्वीर ही जब गर्दिशे-अय्याम सी है 


 उसकी तस्वीर ही जब गर्दिशे-अय्याम सी है
सारी दुनिया ही क्या इश्क़ में नाकाम सी है

दोस्तो ! तुम मुझे नुक्कड़ पे खड़ा रहने दो
ये गली शहर में पहले ही से बदनाम सी है

कौन आबाद है इन रेत के सहराओं में
ऊँचे टीलों की ये परछाईं दरो-बाम सी है

इन्तिज़ार-ए-शबे-ग़म इतना बता दूँ तुझको
दिन निकलते ही हर इक छाँव मुझे शाम सी है

दो दिलों में ये मुहब्बत का नशा सा तो नहीं
तेरी आँखों में ये सुर्ख़ी किसी इल्ज़ाम सी है

मुझसे मत पूछ कि क्या होना है आगे चलकर
इब्तिदा ही तेरे आग़ाज़ की अंजाम सी है

होशियारी से ही साहिल पे लगाना कश्ती
झील ये 'माँझी' छलकता हुआ इक जाम सी है
                                       -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. सहराओं=रेगिस्तानों, 2. दरो-बाम=दरवाज़े और छत,
3. इब्तिदा=शुरुआत, 4. आग़ाज़=कार्य का प्रारम्भ करना।

(हादिसा हूँ मैं' से)

Thursday, June 9, 2016

343. मन की दूरी मिटा सकोगे तुम ?


मन की दूरी मिटा सकोगे तुम ?
इतना नज़दीक आ सकोगे तुम ?

ढूँढ पाए न कोई भी तुमको
मुझमें ऐसे समा सकोगे तुम ?

खोलकर खिड़कियाँ अँधेरे की
धूप घर में बुला सकोगे तुम ?

अपनी करनी के बाद महफ़िल में
अपना चेहरा दिखा सकोगे तुम ?

शान्त सागर में आज फिर 'माँझी'
कोई तूफ़ान ला सकोगे तुम ?
                            -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Man ki doorii miTaa sakoge tum ?
Itnaa nazdeek aa sakoge tum ?

DHooNDH paaye na koi bhi tumko
Mujh meiN aise samaa sakoge tum ?

Khol kar khiDkiyaaN andhere ki
Dhoop ghar meiN bulaa sakoge tum ?

Apnee karnee ke baad mehfil meiN
Apnaa chehraa dikhaa sakoge tum ?

ShaaNt saagar meiN aaj phir 'Manjhi'
Koi toofaan laa sakoge tum ?

~ Devender Manjhi

Wednesday, June 8, 2016

342. जब वो सुनता है मेरे नाम का चर्चा अक्सर 


जब वो सुनता है मेरे नाम का चर्चा अक्सर
काट   लेता   है   उसे   एक   ततैया अक्सर

जिसने जीने का सलीक़ा ही बदल डाला था
याद आता है मुझे प्यार वो पहला अक्सर

कौन-से जन्म का ये वैर निकाले मुझसे
मुझको हँसने ही नहीं देता है शीशा अक्सर

कुछ तो एे वक़्त के चौराहो बताओ मुझको
बन के रह जाता हूँ क्यों मैं ही तमाशा अक्सर

जीत की बाज़ी भी हारी है सदा मैंने ही
चूक जाता है क्यों मेरा ही निशाना अक्सर

याद 'माँझी' को कबीरा का ही दोहा आये
देखकर दूर से पानी का बबूला अक्सर
                              -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Monday, June 6, 2016

341. ख़ुद को साफ़ बचा लो तुम 


ख़ुद को साफ़ बचा लो तुम
वहम न दिल में पालो तुम

मैं तो इनसे ऊब गया
मेरे ख़्वाब सम्हालो तुम

चुप सबकी मजबूरी हो
ऐसा प्रश्न उछालो तुम

अँधियारे को शरण न दे
दीपक को समझालो तुम

आने वाला है तूफ़ान
'मांझी' नाव सम्हालो तुम
                    -देवेन्द्र माँझी

Thursday, June 2, 2016

340. तूने बदल के रख दिए मानी तमीज़ के 


तूने बदल के रख दिए मानी तमीज़ के
टूटे हैं दो बटन अगर मेरी क़मीज़ के

अपने सभी उसूल अब रक्खो भी अपने पास
बच्चों ने कह दी बात ये पापा से खीज के

दम तोड़ते हुए भी है तेरी ही रट लिए
क़िस्से सुने नहीं कभी ऐसे मरीज के

मुझको अजीब लग रहा है माजरा सभी
कैसे गिनाऊँ दोष मैं अपने अज़ीज़ के

कश्ती सम्हाल पाये कब चप्पू चलाये वो
'माँझी' बना हुआ है जो पानी में भीज के
                                -देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. मानी=अर्थ, मतलब, 2. तमीज़=शिष्टता, तहज़ीब, 3. अज़ीज़=प्रिय, 4. भीज के=भीगकर। 

Too ne badal ke rakh diye maani tameez ke
TooTe haiN do 'button' agar meri qameez ke

Apne sabhi usool ab rakkho bhi apne paas
BachchoN ne kah di baat ye papa se kheej ke

Dam toD.te hue bhi hai teri hi raT liye
Qisse sune nahiiN kabhi aise mareej ke

Mujh ko ajeeb lag rahaa hai maajraa sabhi
Kaise ginaauN dosh maiN apne azeez ke

Kashtee samhaal paaye kab chappuu chalaaye vo
'Manjhi' banaa huaa hai jo paani meiN bheej ke

~ Devender Manjhi

Bheej ke = bheeg kar, tar-ba-tar hokar

Tuesday, May 31, 2016

339. लिखूँ भी क्या भला अब मैं नया-सा 


लिखूँ भी क्या भला अब मैं नया-सा
सभी कुछ तो लगे पहले कहा-सा

मुहब्बत की इबारत लिख रहा हूँ
अलग बैठा हूँ यूँ हारा-थका-सा

उसी ने पार की सीमाएँ सारी
मुझे जो शख्स लगता था भला-सा

सचाई कह गए जब होंठ मेरे
ज़माना हो गया मुझसे ख़फ़ा-सा

न तू अब कर नदी की बात 'माँझी'
मुझे लगता है सब-कुछ डूबता-सा
                         -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

LikhuuN bhi kyaa bhalaa ab maiN nayaa sa
sabhi kuchh to lagey pahle kahaa sa

Muhabbat kii ibaarat likh rahaa hooN
Alag baiTHaa huuN yooN haara-thakaa sa

Usee ne paar kee seemaaeN saarii
Mujhe jo shakhs lagtaa tha bhalaa sa

Sachaaii kah gaye jab hoNTH mere
Zamaana ho gayaa mujh se KHafaa sa

Na too ab kar nadii kii baat "Manjhi"
Mujhe lagtaa hai sab-kuchh doobtaa sa

                            ~ Devender Manjhi

Monday, May 30, 2016

338. कैसे होंगे दुनिया वालो  आँखों  के साकार सपन 


कैसे होंगे दुनिया वालो  आँखों  के साकार सपन
पहले तो धरती बाँटी थी, बाँट रहे हो आज गगन

देख पराई मस्ती को क्यों टीस उठी जाती है ये
मन तो पावन मन्दिर है मत रक्खो इसमें आग-जलन

अपने क़द को तुम ही नापो, तुम ही उस पर नाज़ करो
तुमसे अपनी तुलना कैसी, तुमको बारम्बार नमन

और पता मैं लिखवा दूँ तो झूठा फर्जी होगा वो
जिसमें रहता हूँ मुद्दत से उस घर का है नाम 'बदन'

ढूँढ रही है दुनिया क्यों अब उस गुमनाम फ़रिश्ते को
'माँझी' बनकर देख रहा था जो लहरों का चाल-चलन
                                                        -देवेन्द्र माँझी
(हादिसा हूँ मैं' से)

Kaise hoNge duniya waalo, aankhoN ke saakaar sapan ...
Pahle to dhartii baaNTee thi, baaNT rahe ho aaj gagan ...

Dekh paraaii masti ko kyoN Tees uTHee jaati hai ye ...
Man tou paawan mandir hai, mat rakho is meiN aag-jalan ...

Apne qad ko tum hi naapo, tum hi us par naaz karo ...
Tum se apnii tulnaa kaisi, tum ko baarambaar naman ...

Aur pataa maiN likh.vaa dooN tou jhooTHaa farzee hogaa vo ...
Jis meiN rahtaa hooN muddat se, us ghar ka hai naam 'badan'

DHooNDH rahii hai duniya kyoN ab us ghum.naam farishte ko ...
"Manjhi" ban kar dekh rahaa tha, jo lehroN ka chaal-chalan

                                                                 ~ Devender Manjhi

Wednesday, May 25, 2016

337. सबसे तो कर ली पहचान 


सबसे तो कर ली पहचान
ख़ुद से है अब तक अंजान

रख ले होंठों पर मुस्कान
इतना कर ले, मेरी मान

माँगे से कब मिलते हैं
प्यार, भरोसा औ' सम्मान

आपस में क्यों लड़ती हैं
गीता, बाईबिल औ' कुरआन

इन्सानों में देखे हैं
पीर, पयम्बर औ' शैतान

अब चलने की बारी है
बाँध लिया सारा सामान

सबकी आँखों में 'माँझी'
ठहरा-ठहरा सा तूफ़ान
                    -देवेन्द्र माँझी

('हादिसा हूँ मैं' से)

Tuesday, May 24, 2016

336. इसी भँवर से हर एक शख़्स को गुज़रना है 


इसी भँवर से हर एक शख़्स को गुज़रना है
हिसार पानियों का टूटकर बिखरना है

सज़ाएँ सच से मुझे दूर कर न पाएँगी
ये जुर्म है तो मुझे बार-बार करना है

तेरी जुदाई में रो-रोके एक दिन एे दोस्त
ये सारा दश्त मुझे आँसुओं से भरना है

ये सोचकर मैं कभी छाँव में नहीं बैठा
गई रुतों का यहाँ क़ाफ़िला ठहरना है

बहुत-से लोग हैं टूटी-सी नाव में ' माँझी'
उभरते-डूबते दरिया के पार उतरना है
                              -देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. हिसार=घेरा, २. दश्त=जंगल। 

Isee bhaNvar se har ek shaKHs ko guzarnaa hai
Hisaar paaniyoN ka TooTkar bikharnaa hai

SazaaeN sach se mujhe door kar na paaeNgee
Ye jurm hai tou mujhe baar-baar karnaa hai

Teri judaaii meiN ro - ro ke ek din ae dost
Ye saara dasht mujhe aaNsuoN se bharnaa hai

Ye soch kar maiN kabhi chhaaNv MeiN nahiN baiTHaa
Gaii rutoN ka yahaaN qaafilaa THaharnaa hai

Bahut se log haiN TooTee si naav meiN 'Manjhi'
Ubharte- Doobte dariya ke paar utarnaa hai

~ Devender Manjhi

Hisaar = Gheraa
Dasht = Jangal

Monday, May 23, 2016

335. अपने आँगन में धूल  की बातें 


अपने आँगन में धूल की बातें
क्यों करें हम फ़िज़ूल की बातें

ना-नुकर की बहुत ही पहले तो
और फिर सब क़बूल की बातें

मैंने पाये हैं ज़ख़्म ही उनसे
मुझसे छेड़ो न फूल की बातें

शाख और पत्तियों में उलझे सब
कोई करता न मूल की बातें

आज दरिया में खो गया 'माँझी'
रास आईं न कूल की बातें
                      -देवेन्द्र माँझी

-शब्दार्थ--१. मूल=जड़, २. कूल=किनारा।

('हादिसा हूँ मैं' से)
Apne aaNgan meiN dhool ki baateiN
KyoN kareiN ham fizool ki baateiN

Naa-nukur kee bahut hi pehle tou
Aur phir sab qubool ki baateiN

MaiN ne paaye haiN zaKHm hi un se
Mujh se chheDo na phool ki baateiN

Shaakh aur pattiyoN mein uljhe sab
Koi kartaa na mool* kee baatein

Aaj dariya mein kho gayaa "Manjhi"
Raas aayii na kool* kii baatein

~ Devender Manjhi

* mool = asal, jaD,
* Kool = kinaaraa

Sunday, May 22, 2016

334. धूप के लम्बे दरख़्तों के तले 


धूप के लम्बे दरख़्तों के तले
जल उठे नाज़ुक बदन सब छाँव के

 जब इन्हीं पर धूल की परतें जमीं
क्या बताएँगे हक़ीक़त आईने

याद के साये ने मुझको जब छुआ
बह चली रक्तिम नदी क्यों आँख से

जाने क्या अनहोनी होगी आज फिर
काँपते हैं सब परिन्दे शहर के

जूझता था जिनसे 'माँझी' आज तक
वो  नए तेवर लिये तूफ़ान थे
                  -देवेन्द्र माँझी
('हादिसा हूँ मैं' से )

Dhoop ke lambey daraKHtoN ke taley
Jal uTHey naazuk badan sab chhaaNv ke

Jab inhiN par dhool ki parteiN jameeiN
Kyaa bataayeNge haqeeqat aaiine

Yaad ke saaye ne mujh ko jab chhuaa
Beh chalee raktim* nadee kyoN aankh se

Jaane kyaa anhonee hogii aaj phir
KaaNp'te haiN sab parinde shehar ke

Joojhtaa thaa jinse "Manjhi" aaj tak
Vo naye tevar liye toofaan they

~ Devender Manjhi

* Raktim = khoon aalooda, khoon ke raNg ka, lahoo.gooN, khooNaab

Friday, May 20, 2016

333. यूँ तो हमारे साथ ही वो भी सफ़र में था 


यूँ तो हमारे साथ ही वो भी सफ़र में था
लेकिन न जाने कौन से  अनजाने डर में था

मातम हरेक फूल के चेहरे पे लिख गया
धब्बा जो एक ख़ून का तितली के पर में था

आँखों को चीरता गया अख़बार सुबह का
एक ऐसा ख़ूनी हादिसा पहली ख़बर में था

अनजान मैं बना रहा कुछ बात सोचकर
जो मुझसे छुप रहा था वो मेरी नज़र में था

ललकारते हो किसलिए बेबस परिन्द को
जितना भी ज़ोर उसका था, सब बालो-पर में था

हासिल हुई न पानी की दो-चार बूँद भी
'मांझी' तो बस सुराब के तपते भँवर में था
                                             -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--१. बालो-पर=पंख और डैने, २. सुराब=मृगमरीचिका।

(हादिसा हूँ मैं' से)

Tuesday, May 17, 2016

 332. आंसुओ! ठहरो! न आओ मुस्कुराने के लिए 


आंसुओ! ठहरो! न आओ मुस्कुराने के लिए
लोग सब बेताब हैं बातें बनाने के लिए

चील, कव्वे, गिद्ध ही क्यों इस क़दर बदनाम हैं
दोस्त भी कुछ कम नहीं हैं नोंच खाने के लिए

मैं नहीं ईसा बना तो इसमें उसका क्या क़ुसूर
शहर तो तैयार है सूली सजाने के लिए

गाँव  से मुझको भी काफ़ी प्यार है पर क्या करूँ
कोई कहता ही नहीं है लौट आने के लिए

ले चलो 'मांझी'  ये कश्ती, दूर साहिल से कहीं
और क्या-क्या हम सहें, ज़ालिम ज़माने के लिए
                                                 देवेन्द्र माँझी
(हादिसा हूँ मैं' से)


AansuoN ! THahro ! na aao muskuraane ke liye ...
Log sab betaab haiN baateN banaane ke liye ...

Cheel, kavvey, giddh hee kyoN is qadar badnaam haiN ...
Dost bhi kuchh kam nahiiN haiN noch khaane ke liye ...

MaiN naheeN EISAA banaa tou ismeiN us ka kyaa qusoor ...
Shahar tou taiyyaar hai soolee sajaane ke liye ...

GaaNv se mujh ko bhi kaafi pyaar hai par kyaa karooN ...
Koi kahtaa hi nahiiN hai lauT aane ke liye ...

Le chalo 'Manjhi' ye kashtii door saahil se kahiiN ...
Aur ham kya-kya saheiN, zaalim zamaane ke liye ...

                                               ~ Devender Manjhi

Monday, May 16, 2016

331. शोख़ मंज़र है कोई रूप सुनहरा जैसे 


शोख़ मंज़र है कोई रूप सुनहरा जैसे
याद आ जाए है वो चम्पई चेहरा जैसे

मैंने चढ़-चढ़के फ़सीलों पे सदायें दी हैं
कोई सुनता ही न था शहर हो बहरा जैसे

सोचकर बारहा दरवाज़े  लौट आया हूँ
मेरे दुश्मन का हो उस शख़्स पे पहरा जैसे

ऐसे गुज़रा हूँ झुलसते हुए सहराओं से
ठण्डी छाँव में कोई काफ़िला ठहरा जैसे

ज़िन्दगी मौजे-हवादिस में ही गुज़री 'माँझी'
नाव के साथ बहे घाव भी गहरा जैसे
                       -देवेन्द्र मांझी

Sunday, May 15, 2016

330. जब से तन्हा रहता हूँ 


जब से तन्हा रहता हूँ
सचमुच काफ़ी अच्छा हूँ

मेरी हालत क्या पूछो
शाख से टूटा पत्ता  हूँ

आँख ज़माने की भीगीं
ख़ुद से ऐसा रूठा हूँ

मुझमें-तुझमें फ़र्क़ है क्या
अब आकर मैं समझा हूँ

कहने को बस 'माँझी' हूँ
लहर-लहर में डूबा हूँ
                  -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Thursday, May 12, 2016

329. ज़िन्दगी को इस तरह ढोते नहीं 


ज़िन्दगी को इस तरह ढोते नहीं
बस करो, अब और समझौते नहीं

इन दरख़्तों से कहो इठलायें ना
फूल और पत्ते सगे होते नहीं

आँख हैं ज़िन्दा तो पल जाएँगे और
टूट जाएँ ख़्वाब तो रोते नहीं

कारवाँ की रहनुमाई के लिए
जो निकलते हैं कभी खोते नहीं

रौशनी कितनी है ये मत पूछिए
रात-भर जुगनू कभी सोते नहीं

कौन लाता नाव 'माँझी' खींचकर
हम जो अपने आप में होते नहीं
                         -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Wednesday, May 11, 2016

328. अपनी तबाहियों की दुआ माँगता हूँ मैं 


अपनी तबाहियों की दुआ माँगता हूँ मैं
सबकी नज़र में है जो वही हादिसा हूँ मैं

मुझमें अगर खरोंच है तो मेरा क्या क़सूर
सूरत है जिसमें वक़्त की वो आईना हूँ मैं

आये बहुत ही ताव में लौटे मगर उदास
जिस पर न चल सका कोई वो रास्ता हूँ मैं

लड़ता रहा हूँ रात भर इस तीरगी से मैं
आई क़रीब सुब्ह तो अब काँपता हूँ मैं

बेकार 'माँझी' तुम यहाँ पतवार लाये हो
जो कट सके किसी से न वो दायरा हूँ मैं
                                  -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. तीरगी=अँधेरा, 2.सुब्ह=प्रांत:काल।

(हादिसा हूँ मैं' से)
Apnee tabaahiyoN kii duaa maaNgtaa hooN maiN ...
Sabkee nazar meiN hai jo, vohi haadisa hooN main ...

Mujh meiN agar kharoNch hai tou mera kyaa qusoor ...
Soorat hai jis meiN waqt kii voh aaiinaa hooN maiN ...

Aaye bohot hii taav meiN lautey magar udaas
Jis par na chal sakaa koii voh raastaa hooN maiN

LaDtaa rahaa hooN raat bhar is teergii se maiN
Aaii qareeb sub'h tou ab kaaNptaa hooN maiN

Bekaar "Manjhi" tum yahaaN patwaar laaye ho ...
Jo kaT sakey kisi se na, voh daayraa hooN maiN

                                               ~ Devender Manjhi

Monday, May 9, 2016

327.  इससे पत्थर का यक़ीं लाख भला है यारो 


इससे पत्थर का यक़ीं लाख भला है यारो
मुझको शीशे के समन्दर ने छला है यारो

अब तो मुमकिन ही नहीं और में उसका ढलना
ऐसे साँचे में वो इक शख़्स ढला है यारो

जिसके होंठों पे हँसी रक़्स किया करती है
वो चराग़ों-सा हर इक रात जला है यारो

मर तो जाते हैं सभी वक़्त के मारे लेकिन
आज के दौर में जीना भी कला है यारो

नाव 'माँझी' ने बढ़ाई यही कहकर सबसे
अब तो अनदेखा जहाँ हमको भला है यारो
                                      -देवेन्द्र मांझी

शब्दार्थ--1. रक़्स=नृत्य।

(हादिसा हूँ मैं' से)

Is se patthar ka yaqeeN laakh bhalaa hai yaaro
Mujhko sheeshe ke samandar ne chhalaa hai yaaro

Ab tou mumkin hi nahiiN aur meiN uskaa DHalnaa
Aise saaNche meiN vo ik shaKHs DHalaa hai yaaro

Jis ke hothoN pe haNsii raqs kiyaa kartee hai
Vo charaaghoN sa har ik raat jalaa hai yaaro

Mar tou jaate haiN sabhi waqt ke maare lekin
Aaj ke daur meiN jeenaa bhi kalaa* hai yaaro

Naav "Manjhi" ne baDHaaii yahii kehkar sab se
Ab tou andekhaa jahaaN ham ko bhalaa hai yaaro

                                                    ~ Devender Manjhi

* kalaa = art, fan, hunar

Tuesday, May 3, 2016

326.  सांस लेने को ज़िन्दगी कह दूँ 


सांस लेने को ज़िन्दगी कह दूँ
आँख हो नम तो क्यों ख़ुशी कह दूँ

मैं अगर हूँ तो क़द्र है तेरी
तुझसे ये बात राज़ की कह दूँ

इसलिए कह रहा हूँ मेरे हो
तुमने चाहा है मैं यही कह दूँ

तू अँधेरे की सिर्फ़ चाहत है
तुझसे ये बात चाँदनी कह दूँ

रोक लो नाव टुक अभी 'माँझी'
बात अपनी मैं आख़िरी कह दूँ
                      -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Monday, May 2, 2016

325.  इतने रूप बदलता क्यों है 


इतने रूप बदलता क्यों है
साया मुझको छलता क्यों है

दर्द मेरा नग़मों में आकर
लम्हा-लम्हा ढलता क्यों है

साँप नया नित आकर मेरी
आस्तीन में पलता क्यों है

झूठ, कपट, भ्रम की भट्टी में
आख़िर मानव जलता क्यों है

ख़ून-सने पाँवों से 'माँझी'
पानी पर तू चलता क्यों है
                   -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Friday, April 29, 2016

324. सच है सर का डर आख़िर 


सच है सर का डर आख़िर
पत्थर है पत्थर आख़िर

घर की सी कुछ बात नहीं
कैसे कह दूँ घर आख़िर

सबकी मंज़िल एक वही
कैसा है वो दर आख़िर

हम भी समझें बात तेरी
कोई इशारा कर आख़िर

लहरों की 'माँझी' क्यों रोज़
खाता है ठोकर आख़िर
                   -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Sach hai sar ka Dar aakhir
Patthar hai patthar aakhir

Ghar ki si kuchh baat nahiN
Kaise kah duuN ghar aakhir

Sab ki manzil ek vohi
Kaisa hai vo dar aakhir

Ham bhi samjheN baat teri
Koi ishaara kar aakhir

LehroN kii "Manjhi" kyoN roz
Khaata hai THokar aakhir

~ Devender Manjhi

Wednesday, April 27, 2016

323.  अपना तुझे बनाकर देखा 


अपना तुझे बनाकर देखा
ये धोखा भी खाकर देखा

मुँह फेरा तब ही यारों ने
जब भी दर्द सुनाकर देखा

सब रस्ते यकसाँ हैं यारो
चौराहों पर आकर देखा

लौ के अन्तस की गर्मी को
अपना हाथ जलाकर देखा

सब 'माँझी' को छोड़ चले थे
कश्ती पार लगाकर देखा
                      -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Apna tujhe banaa kar dekha
Ye dhokha bhi khaa kar dekha

MuNh phera tab hi yaaroN ne
Jab bhi dard sunaa kar dekha

Sab raste yaksaaN haiN yaaro
ChauraahoN par aakar dekha

Lau ke antas ki garmii ko
Apna haath jalaa kar dekha

Sab 'Manjhi' ko choRR chale the
Kashtee paar lagaa kar dekha

~ Devender Manjhi

Sunday, April 24, 2016

322. ख़ुद को अपना बना गए तो 


ख़ुद को अपना बना गए तो
ख़ूब निभेगी, निभा गए तो

सारी दुनिया ही चौंकेगी
खोटा सिक्का चला गए तो

परसुराम फिर चीख़ उठेगा
शब्द स्वयंबर रचा गए तो

आख़िर अपनी कर ही बैठे
तुम भी चूना लगा गए तो

क्या तूफ़ान उठेंगे फिर भी
'माँझी' चप्पू चला गए तो
               देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

KHud ko apnaa banaa ga_e tou
KHoob nibhegii, nibhaa ga_e tou

Saarii duniya hi chauNkegii
KhoTaa sikkaa chalaa ga_e tou

"Parashuraam" phir cheeKH uTHegaa
Shabd swayambar rachaa ga_e tou

AaKHir apnee kar hi baiTHe
Tum bhi choonaa lagaa ga_e tou

Kyaa toofaan uTHe'nge phir bhi
"Manjhi" chappoo chalaa ga_e tou

~ Devender Manjhi

Thursday, April 21, 2016

321.  सूरज के आसपास से उतरा है कोई शख़्स 


सूरज के आसपास से उतरा है कोई शख़्स
साये में धूप की तरह बिखरा है कोई शख़्स

पहचान ही न हो सकी किसका वो अक़्स है
शीशों के बीचोंबीच से उभरा है कोई शख़्स

डरने लगा है आज वो ठण्डी हवाओं से
आतिश-परस्त दौर से गुज़रा है कोई शख़्स

मातम मना रहे हैं जो अग्यार की तरह
नाक़ामियों की झील से उभरा है कोई शख़्स

'माँझी' तो साँस रोक के सब देखता रहा
अंधी गली के मोड़ से गुज़रा है कोई शख़्स
                                -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. अग्यार=ग़ैर का बहुवचन।

(हादिसा हूँ मैं' से)

Sooraj ke aas'paas se utraa hai koi shaKHs
Saaye meiN dhoop ki tarah bikhraa hai koi shaKHs

Pehchaan hi na ho sakee kiskaa vo aks hai
SheeshoN ke beech'o'beech se ubhraa hai koi shakhs

Darne lagaa hai aaj vo THa'ndhee hawaaoN se
Aatish-parast daur se guzraa hai koi shaKHs

Maatam manaa rahe haiN jo agyaar ki tarah
NaakaamiyoN ki jheel se ubhraa hai koi shaKHs

"Manjhi" tou saaNs rok ke sab Dekhtaa rahaa
Andhii galee ke moD se guzraa hai koi shaKHs

~ Devender Manjhi

Tuesday, April 19, 2016

320. दूर था मंज़िल से जितना नक़्शे-पा अच्छा लगा 


दूर था मंज़िल से जितना नक़्शे-पा अच्छा लगा
मुझको जाने किसलिए वो फ़ासिला अच्छा लगा

रोज़ ही चेहरे की मेरे छीन लेता था हँसी
टूटकर बिखरा ज़मीं पर आईना अच्छा लगा

जानता हूँ आप न आयेंगे मेरे घर कभी
पर जो पूछा आपने मेरा पता अच्छा लगा

किसलिए बुनता रहा आँखों में अपने ख़्वाब रोज़
किसलिए टूटन का आख़िर सिलसिला अच्छा लगा

शान्त लहरों से तो हम ऊबे हैं 'माँझी' बारहा
जब उठा दरियाओं में तूफ़ान-सा अच्छा लगा
                                      -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. नक़्शे-पा=पाँव के निशान।
(हादिसा हूँ मैं' से)

Door tha manzil se jitnaa Naqsh-e- paa achchhaa lagaa...
Mujh ko jaane kis liye vo faasila achchhaa lagaa...

Roz hi chehre ki mere chheen letaa tha haNsee
TooT kar bikhraa zamiN par aaiinaa achchhaa lagaa...

Jaan'taa huN aap na aayeNge mere ghar kabhi...
Par jo puuchhaa aap ne mera pataa achchhaa lagaa...

Kis liye buntaa rahaa aaNkhoN meiN apne khwaab roz...
Kis liye TooTan ka aakhir silsilaa achchhaa lagaa...

ShaaNt lehroN se tou ham uu'bey haiN "Manjhi" baar'haa...
Jab uTHaa dariyaaoN meiN toofaan sa achchhaa lagaa...

                                                    ~ Devender Manjhi

Monday, April 18, 2016

319.  चुप रहा हादिसों के डर से मैं 


चुप रहा हादिसों के डर से मैं
जब निकाला गया था घर से मैं

आज तक मैं नहीं समझ पाया
क्यों गिराया गया नज़र से मैं

देवता बन गया था ख़ुद में जो
लौट आया उसी के दर से मैं

लोग पत्थर लिए खड़े दीखे
आज निकला जिधर-जिधर से मैं

मौज 'माँझी' डुबोने आई थी
बच ही निकला इधर-उधर से मैं
                        -देवेंद्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Chup Rhaa Hadiesho Kai Darr Se Mai
Jab Nikala Gya Tha Ghar Se Mai


Aaj Tak Mai Samjh Nhi Paaya
Kyu Giraya Gya Nazar Se Mai

Devta Bn Gya Tha Khud Mai Jo
Lout Aaya Usii K Dar Se Mai

Log Patther Liye Khadey Dikhey
Aaj Nikla Jidhar Jidhar Se Mai

Mouj Manjhi Dubone Aayi Thi
Bach Hi Nikal Idhar Udhar Se Mai

Devender Manjhi
(Hadisha Hoon Mai, Se)

Sunday, April 17, 2016

318. मुझको तुम पर ग़ुरूर था काफ़ी 


मुझको तुम पर ग़ुरूर था काफ़ी
इसलिए ख़ुद से दूर था काफ़ी

चाँद लूटा है रात-भर उसने
आज शबनम पे नूर था काफ़ी

इन अंधेरों में घर नहीं लुटता
रौशनी का क़सूर था काफ़ी

मैं जो चुप था तो एक मतलब था
दर्द दिल में हुजूर था काफ़ी

आज डूबा जो नाव में 'माँझी'
अपनी मस्ती में चूर था काफ़ी
                          -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Mujh ko tum par guroor tha kaafi Isliye khud se door tha kaafi ChaaNd loota hai raat bhar us ne Aaj shabnam pe noor tha kaafi In andheroN meiN ghar nahiN luTtaa Raushani ka qusoor tha kaafi MaiN jo chup tha to ek matlab tha Dard dil meiN hujoor tha kaafi Aaj dooba jo naav meiN "Manjhi" Apnee masti meiN choor tha kaafi ~ Devender Manjhi

Thursday, April 14, 2016

317. तुम क्या समझे, कम लगता है 


तुम क्या समझे, कम लगता है
सच कहने में दम लगता है

सारी दुनिया से ज़्यादा क्यों
सबको अपना ग़म लगता है

देख के अपनी आँखें मुझको
बरसाती मौसम लगता है

पत्थर लेकर आया है जो
मेरा ही हमदम लगता है

यूँ ही तो गुमसुम है 'माँझी'
झील में पानी कम लगता है

(हादिसा हूँ मैं' से)

Tum kya samjhe, kam lagtaa hai 
Sach kahne meiN dam lagtaa hai 

Saari duniya se zyaada kyoN 
Sab ko apna gham lagtaa hai 

 Dekh ke apni aankheN mujh ko 
Barsaati mausam lagtaa hai 

 Patthar lekar aaya hai jo
Meraa hi ham'dam lagtaa hai 

YuuN hi tou gum'sum hai "Manjhi" 
Jheel meiN paani kam lagtaa hai 
                             - Devender Manjhi

Wednesday, April 13, 2016

316. ठुकराएँ या प्यार बढ़ाएँ देखेंगे 


ठुकराएँ या प्यार बढ़ाएँ देखेंगे
हमसे मिलने तो वो आएँ, देखेंगे

कुछ बोलेंगे या ख़ामोश रहेंगे हम
पहले अपना प्रश्न उठाएँ, देखेंगे

ख़ूब सुना है, अब-तक देख न पाए हम
क्या हैं उसकी ख़ास अदाएँ, देखेंगे

दीप नहीं जो बुझ जाएँ हम ज्वाला हैं
तूफ़ानी वो तेज़ हवाएँ, देखेंगे

गहरे पानी से निकला है 'माँझी' वो
देगा कैसी ख़ास दुआएँ, देखेंगे
                     -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

THukraaeN yaa pyaar baDHaaeN, dekheNge
Hamse milne tou vo aaeN, dekhe'ne 

Kuchh bole'nge yaa khaamosh rahe'nge ham 
Pahle apna "prashna" uTHaae'n, dekhe'nge 

Khoob sunaa hai, ab'tak dekh na paae ham 
Kyaa hai'n unkii khaas adaae'n, dekhe'nge 

Deep nahi'n jo bujh jaae'n, ham jwaala hai'n 
Toofaani vo tez hawaae'n, dekhe'nge 

Gahre paani se niklaa hai "Manjhi" vo 
Degaa kaisi KHaas duaae'n, dekhe'nge 
                         - Devender Manjhi 
Prashna = sawaal 
Jwaala = aag ki baDee lapte'n

Tuesday, April 5, 2016

315. भूलना परछाइयों का ख़ौफ़ गर मुमकिन नहीं 


भूलना परछाइयों का ख़ौफ़ गर मुमकिन नहीं
कर सकेंगे आप अपना तै सफ़र मुमकिन नहीं

घर से जो आँसू की सूरत चल पड़े संन्यास लेकर
लौट आएंगे कभी वो अपने घर मुमकिन नहीं

वक़्त को मुट्ठी में अपनी क़ैद करने के लिए
आप ज़िद पर तो अड़े हैं, ये मगर मुमकिन नहीं

सोच का सूरज उगे भी तो यक़ीनी जान लो
धूप में जल जाए ये सारा नगर मुमकिन नहीं

ये सफ़र है आग का दरिया ये 'माँझी' सोच लो
लौट आओ नाव में तुमसे अगर मुमकिन नहीं
                                              -देवेन्द्र माँझी
('हादिसा हूँ मैं' से)

Bhool'na parchhaaiyo'n ka KHauf gar mumkin nahi'n
Kar sake'nge aap apnaa tai safar mumkin nahi'n

Ghar se jo aa'nsuu ki soorat chal paDe sanyaas lekar
lauT aae'nge kabhi vo apne ghar mumkin nahi'n

Waqt ko muT'thee me'n apnee qaid karne ke liye
Aap zid par tou aRRe hai'n, ye magar mumkin nahi'n

Soch ka sooraj u'ge bhi tou yaqiinee jaan lo
Dhoop me'n jal jaaye ye saara nagar mumkin nahi'n

Ye safar hai aag ka dariya ye "Manjhi" soch lo
lauT aao naav me'n tumse agar mumkin nahi'n

- Devender Manjhi

Sunday, April 3, 2016

314.  हाँ, भरी महफ़िल में वो नंगा हुआ 


हाँ, भरी महफ़िल में वो नंगा हुआ
उठ गया पर्दा, चलो अच्छा हुआ

ले गया नींदें जो मेरी छीनकर
एक सपना था कोई टूटा हुआ

मौत ही उसको मनाकर ले गई
था जो अपने आपसे रूठा हुआ

तुमने सब चालें बदल डालीं मेरी
मैंने था कुछ और ही सोचा हुआ

मुझको ले जाएगा शायद अपने साथ
वक़्त है 'माँझी' यहाँ ठहरा हुआ
                        -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Haa'n, bhari mehfil me'n vo na'ngaa huaa 
UTH gayaa pardaa, chalo achchhaa huaa 

 Le gayaa nee'nde'n jo meri chheen kar 
Ek sapnaa thaa koii TuuTaa huaa 

Maut hii usko manaa kar le gaii 
Thaa jo apne aap se ruuTHaa huaa 

 Tum ne sab chaale'n badal Daalee'n meri 
Mai'ne thaa kuchh aur hi sochaa huaa 

Mujh ko le jaaegaa shaayad apne saath 
Waqt hai "Manjhi" yahaa'n THahraa huaa 
                               - Devender Manjhi

Thursday, March 31, 2016

313. बारहा जीना पड़ा, मरना पड़ा 


बारहा जीना पड़ा, मरना पड़ा
इस तरह भी तय सफ़र करना पड़ा

वक़्त का मरहम लगाकर दोस्तो
ज़ख़्म अपना ख़ुद हमें भरना पड़ा

साजिशों की गर्म-बाज़ारी न पूछ
मुझको अपने साये से डरना पड़ा

बारहा  ऐसा  हुआ  तेरे  लिए
ज़िन्दगी को दाँव पर धरना पड़ा

बैठकर साहिल पे 'माँझी' याद है
जब समन्दर रेत से भरना पड़ा
                      -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Wednesday, March 30, 2016

312. माना ये कुल जहान तो काला नहीं होगा 


माना ये कुल जहान तो काला नहीं होगा
लेकिन हमारे बाद उजाला नहीं होगा

एहसास जो हुआ नहीं टूटन की टीस का
आँखों में कोई ख़्वाब ही पाला नहीं होगा

बेशक बुतों को पूजिए लेकिन न भूलिए
काफ़िर का बुतक़दे में हवाला नहीं होगा

हो आस्मान साफ़ तो बारिश नहीं होती
तुमने ही ख़ुद को आज सम्हाला नहीं होगा

फँसती ज़रूर मछलियाँ 'माँझी' यक़ीन तो कर
दरिया में तुमने जाल ही डाला नहीं होगा
                                          -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Maanaa ye kul jahaan to kaala nahi'n hoga
Lekin hamaare baad ujaala nahi'n hoga

Ehsaas jo huaa nahi'n TooTan ki Tees ka
Aankho'n mein koii KHwaab hi paala nahi'n hoga

Beshak buto'n ko poojiye lekin na bhooliye
Kaafir ka butqade me'n hawaala nahi'n hoga

Aakaash ho gaye saaf to baarish nahi'n hotee
Tum ne hi KHud ko aaj samhaala nahi'n hoga

Pha'nstee zaruur machhliyaa'n "Manjhi" yaqeen to kar
Dariya me'n tum ne jaal hi Daala nahi'n hoga

- Devender Manjhi

Tuesday, March 29, 2016

311. एक अनहोनी से बच जाएगा ये घर 


एक अनहोनी से बच जाएगा ये घर
इसलिए मैं क़ैद हूँ होंठों के अन्दर

खोल दूँ गर आज अपने होंठ मैं भी
बह्स में पड़ जाएगा सीता-स्वयंवर

अधफटे कपड़ों में, पटरी के किनारे
बैठकर पढ़ते हैं ये सबका मुक़द्दर

छोड़ दी मैंने अगर इक साँस लम्बी
आज ही जल जाएगा सारा समन्दर

दौड़ते हैं किसलिए लहरों पे 'माँझी'
कौन बैठा है नदी के पार जाकर
                       -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से) 

Ek anhonee se bach jaaega ye ghar
Isliye mai'n qaid hu'n ho'ntho'n ke andar

Khol du'n gar aaj apne ho'nth mai'n bhi
Bahas me'n paD jaaegaa seeta-swayamvar

Adh-phate kapDo'n mein, paTree ke kinaare
BaiTH kar paDHte hai'n ye sab ka muqaddar

ChhoD di mai'ne agar ik saa'ns lambee
Aaj hi jal jaaegaa saara samandar

DauRRte hai'n kis liye lahro'n pe "Manjhi"
Kaun baiTHaa hai nadee ke paar jaa kar

- Devender Manjhi



Monday, March 28, 2016

310. ले के ख़त मेरा जो हरकारा गया 


ले के ख़त मेरा जो हरकारा गया
मुफ़्त में मारा वो बेचारा गया

मेरे हिस्से के अँधेरे तू भी जा
अब यहाँ से भोर का तारा गया

जीत के चर्चे थे जिसके हर तरफ़
हारकर सामान वो सारा गया

 सब पड़ा रह जाएगा इक दिन यहाँ
गीत गाता आज बंजारा गया

जब तलक नदियों में था मीठा था जल
क्यों समन्दर में ये हो खारा गया

जब भी मरने की ख़बर 'माँझी' उड़ी
लोग बोले ये कि आवारा गया
                                -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Sunday, March 27, 2016

309. ये नहीं है आप ही मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं 


ये नहीं है आप ही मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं
मेरी अपनी ज़िन्दगी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं

तीरगी से पूछ लेना तुम मेरे घर का पता
इस नगर की रौशनी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं

नोच डालूँगा किसी-दिन उसके चेहरे का नक़ाब
मसनुई वो सादगी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं

कल यही मुझको बताएगी मसीहा दोस्तो
आज माना ये सदी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं

लोग कहते हैं मुझे इस दौर का 'माँझी' मगर
नाव-ओ-पतवार भी मुझसे अभी वाक़िफ़ नहीं
                                  -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. तीरगी=अँधेरा, 2. मसनुई=बनावटी।
(मजबूरियाँ मेरी' से)

Friday, March 18, 2016

308. ख़ुद को शीशे में जब देखेगा तो डर जाएगा 


ख़ुद को शीशे में जब देखेगा तो डर जाएगा
घर के आँगन में तू पतझड़-सा बिख़र जाएगा

ख़ाक पकड़ोगे उसे आहटें सुनकर यारो
वक़्त क़ातिल की तरह छुप के निकल जाएगा

इस दोराहे के सिवा और भी राहें हैं बहुत
किसको मालूम है वो शख़्स किधर जाएगा

ऐसा लगता है कि दोशीज़ा-ए-सहरा इक रोज़
ख़ून से कोई तेरी माँग भी भर जाएगा

उसको आना ही नहीं लौट के इस साहिल पर
जब भी 'माँझी' कोई उस पार उतर जाएगा
                                    -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. दोशीज़ा-ए-सहरा=रेगिस्तान की बेटी।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Khud ko shiishe me'n jab dekhegaa to Dar jaa.egaa 
Ghar ke aa'ngan me'n tuu patjhaD saa bikhar jaa.egaa 

Khaak pakDoge usey aahate'n sun kar yaaro 
Waqt qaatil ki tarah chhup ke nikal jaa.egaa 

 Is doraahe ke sivaa aur bhi raahe'n hai'n bahut 
Kisko maaluum hai vo shaKHs kidhar jaa.egaa 

 Aisa lagtaa hai ki dosheezaa-e-sahraa ik roz 
Khoon se koi teri maa'ng bhi bhar jaa.egaa 

Us ko aana hi nahin laut ke is saahil par 
Jab bhi "Manjhi" koi us paar utar jaa.egaa
                               ~ Devender Manjhi 

Dosheezaa-e-sahraa = registaan ki beti

Wednesday, March 16, 2016

307. लड़खड़ाती ज़िन्दगी है क्या करूँ तू ही बता 


लड़खड़ाती ज़िन्दगी है क्या करूँ तू ही बता
मुझपे अब मुश्किल बनी है क्या करूँ तू ही बता

टीस के इन तम्बुओं में ज़र्द चेहरे हो गए
ख़ौफ़ की आँधी चली है क्या करूँ तू ही बता

पढ़ के जिसको हर किसी की आँख से आँसू गिरे
वो कहानी अपनी ही है क्या करूँ तू ही बता

जिसपे है विश्वास बरसेगी कि वो बदली यहाँ
आँधियों में वो घिरी है क्या करूँ तू ही बता

थामकर पतवार 'माँझी' नाव खींचे किस तरह
हाथ में जब हथकड़ी है क्या करूँ तू ही बता
                                      -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी'

Tuesday, March 15, 2016

306. जिसने अपना रूप निहारा शीशे में 


जिसने अपना रूप निहारा शीशे में
उसने तेरा नाम पुकारा शीशे में

तुझसे ही मिलकर वो कल खोया है
फिरता था जो इक आवारा शीशे में

दुनिया जिसका जश्न मनाती है यारो
रोता है क़िस्मत का मारा शीशे में

मैंने कितनी दहलीज़ों पर पाँव रखे
छाया है जबसे अँधियारा शीशे में

इसने तो प्रतिरूप उतारा तेरा ही
झुँझलाकर क्यों पत्थर मारा शीशे में

'माँझी' उलझन में उलझा है देखो तो
ढूँढ़े है तट का नज़्ज़ारा शीशे में
                        -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Jis ne apna roop nihaara shiishe me'n 
Usne tera naam pukaara shiishe me'n 

Tujh se hi milkar vo kal khoyaa hai 
Phirtaa tha jo ik aawaara shiishe me'n 

Duniya jis ka jashn manaati hai yaaro 
Rotaa hai qismat ka maara shiishe me'n 

Maine kitnii dehleezo'n par paa'NV rakhe 
Chhaayaa hai jab se a'ndhiyaara shiishe me'n 

Is ne tou pratiroop utaara tera hi 
Jhu'njhlaakar kyo'n patthar maara shiishe me'n 

"Manjhi" uljhan me'n uljhaa hai dekho tou 
DHuu'nDHe hai taT ka nazzaara shiishe me'n
                                    ~ Devender Manjhi

Monday, March 14, 2016

305. कैसे कह दूँ हाथ में मेरे कोई शीशा नहीं 


कैसे कह दूँ हाथ में मेरे कोई शीशा नहीं
जो नज़र आता है इसमें चेहरा वो मेरा नहीं

कल खुली छोड़ीं थी मैंने अपने घर की खिड़कियाँ
एक भी झोंका हवा का इस तरफ़ गुज़रा नहीं

आई थीं इस शहर में गर आँधियाँ तब्दील की
ज़र्द पत्ता शाख से क्यों एक भी टूटा नहीं

जाने किस दीवानगी में लिख गया आख़िर में ये
देखता हूँ तेरी मूरत जब नशा होता नहीं

लोग तट पर आके बोले ये है 'माँझी' का कमाल
देखिये उसको मगर एहसास तक इसका नहीं
                                     -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी से)
Kaise kah duu'n haath me'n mere koi sheesha nahi'n 
Jo nazar aata hai isme'n chehraa vo mera nahi'n 

Kal khulii chhoDee'n thi maine apne ghar ki khiDkiyaa'n 
Ek bhi jkho'nkaa hawaa ka is taraf guzraa nahi'n 


Aayi thii'n is shahar me'n gar aa'ndhiyaa'n tabdeel ki 
Zard pattaa shaakh se kyo'n ek bhi TooTaa nahi'n 

Jaane kis deewaangi me'n likh gayaa aaKHir me'n ye 
Dekhtaa hu'n teri murat jab nashaa hota nahi'n 


Log taT par aa ke bole ye hai "Manjhi" ka kamaal 
Dekhiye us ko magar ehsaas tak iskaa nahi'n 
                                                         ~ Devender Manjhi