Thursday, May 12, 2016

329. ज़िन्दगी को इस तरह ढोते नहीं 


ज़िन्दगी को इस तरह ढोते नहीं
बस करो, अब और समझौते नहीं

इन दरख़्तों से कहो इठलायें ना
फूल और पत्ते सगे होते नहीं

आँख हैं ज़िन्दा तो पल जाएँगे और
टूट जाएँ ख़्वाब तो रोते नहीं

कारवाँ की रहनुमाई के लिए
जो निकलते हैं कभी खोते नहीं

रौशनी कितनी है ये मत पूछिए
रात-भर जुगनू कभी सोते नहीं

कौन लाता नाव 'माँझी' खींचकर
हम जो अपने आप में होते नहीं
                         -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

No comments:

Post a Comment