337. सबसे तो कर ली पहचान
सबसे तो कर ली पहचान
ख़ुद से है अब तक अंजान
रख ले होंठों पर मुस्कान
इतना कर ले, मेरी मान
माँगे से कब मिलते हैं
प्यार, भरोसा औ' सम्मान
आपस में क्यों लड़ती हैं
गीता, बाईबिल औ' कुरआन
इन्सानों में देखे हैं
पीर, पयम्बर औ' शैतान
अब चलने की बारी है
बाँध लिया सारा सामान
सबकी आँखों में 'माँझी'
ठहरा-ठहरा सा तूफ़ान
-देवेन्द्र माँझी
('हादिसा हूँ मैं' से)
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