333. यूँ तो हमारे साथ ही वो भी सफ़र में था
यूँ तो हमारे साथ ही वो भी सफ़र में था
लेकिन न जाने कौन से अनजाने डर में था
मातम हरेक फूल के चेहरे पे लिख गया
धब्बा जो एक ख़ून का तितली के पर में था
आँखों को चीरता गया अख़बार सुबह का
एक ऐसा ख़ूनी हादिसा पहली ख़बर में था
अनजान मैं बना रहा कुछ बात सोचकर
जो मुझसे छुप रहा था वो मेरी नज़र में था
ललकारते हो किसलिए बेबस परिन्द को
जितना भी ज़ोर उसका था, सब बालो-पर में था
हासिल हुई न पानी की दो-चार बूँद भी
'मांझी' तो बस सुराब के तपते भँवर में था
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--१. बालो-पर=पंख और डैने, २. सुराब=मृगमरीचिका।
(हादिसा हूँ मैं' से)
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