331. शोख़ मंज़र है कोई रूप सुनहरा जैसे
शोख़ मंज़र है कोई रूप सुनहरा जैसे
याद आ जाए है वो चम्पई चेहरा जैसे
मैंने चढ़-चढ़के फ़सीलों पे सदायें दी हैं
कोई सुनता ही न था शहर हो बहरा जैसे
सोचकर बारहा दरवाज़े लौट आया हूँ
मेरे दुश्मन का हो उस शख़्स पे पहरा जैसे
ऐसे गुज़रा हूँ झुलसते हुए सहराओं से
ठण्डी छाँव में कोई काफ़िला ठहरा जैसे
ज़िन्दगी मौजे-हवादिस में ही गुज़री 'माँझी'
नाव के साथ बहे घाव भी गहरा जैसे
-देवेन्द्र मांझी
No comments:
Post a Comment