325. इतने रूप बदलता क्यों है
इतने रूप बदलता क्यों है
साया मुझको छलता क्यों है
दर्द मेरा नग़मों में आकर
लम्हा-लम्हा ढलता क्यों है
साँप नया नित आकर मेरी
आस्तीन में पलता क्यों है
झूठ, कपट, भ्रम की भट्टी में
आख़िर मानव जलता क्यों है
ख़ून-सने पाँवों से 'माँझी'
पानी पर तू चलता क्यों है
-देवेन्द्र माँझी
(हादिसा हूँ मैं' से)
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