Monday, May 2, 2016

325.  इतने रूप बदलता क्यों है 


इतने रूप बदलता क्यों है
साया मुझको छलता क्यों है

दर्द मेरा नग़मों में आकर
लम्हा-लम्हा ढलता क्यों है

साँप नया नित आकर मेरी
आस्तीन में पलता क्यों है

झूठ, कपट, भ्रम की भट्टी में
आख़िर मानव जलता क्यों है

ख़ून-सने पाँवों से 'माँझी'
पानी पर तू चलता क्यों है
                   -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

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