Thursday, July 7, 2016

356. इतना शोर मचाकर मुझमें 


इतना शोर मचाकर मुझमें
झाँका किसने आकर मुझमें

खोया कौन भरी महफ़िल में
अपना अक़्स छुपाकर मुझमें

मस्त हुआ वो घूम रहा है
शर्म-हया सिमटाकर मुझमें

आँख समन्दर कर देते हैं
याद के बादल छाकर मुझमें

उतरेगा लहरों पर 'माँझी'
फिर तूफ़ान उठाकर मुझमें
                     देवेन्द्र माँझी

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