356. इतना शोर मचाकर मुझमें
इतना शोर मचाकर मुझमें
झाँका किसने आकर मुझमें
खोया कौन भरी महफ़िल में
अपना अक़्स छुपाकर मुझमें
मस्त हुआ वो घूम रहा है
शर्म-हया सिमटाकर मुझमें
आँख समन्दर कर देते हैं
याद के बादल छाकर मुझमें
उतरेगा लहरों पर 'माँझी'
फिर तूफ़ान उठाकर मुझमें
देवेन्द्र माँझी
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