347. अफ़वाहों की तेज़ हवा में सच का दीपक बुझता है
अफ़वाहों की तेज़ हवा में सच का दीपक बुझता है
आवारा बादल के पीछे जैसे सूरज छिपता है
देखो वो दीवाना है या पागल है कुछ तो है वो
घुप्प अँधेरे में बैठा जो दिन की पाती लिखता है
कौन ख़रीदेगा अब इनको, क़ीमत इनकी है भी क्या
जिस्म और ईमान सभी कुछ गली-गली में बिकता है
नाव और पतवार से रिश्ता तर्क किया है उसने अब
तट पर बैठा-बैठा 'माँझी' लहरों को ही गिनता है
-देवेन्द्र माँझी
No comments:
Post a Comment