349. आपका इस ओर से जब रास्ता होता गया
आपका इस ओर से जब रास्ता होता गया
साँस लेना जुर्म जीना हादिसा होता गया
ये नगर बस दाद देता है मेरे अशआर पर
कौन जाने क्या था मैं और क्या से क्या होता गया
चिलचिलाती धूप आकर जब पड़ी सर पर मेरे
एक पैकर छाँव का मुझसे अता होता गया
आग की लपटें लिये दुनिया को झुलसाता रहा
पास आकर मेरे क्यों वो बर्फ़ सा होता गया
नाव 'माँझी' जब बढ़ी दरियाओं की गहराई में
तेज़ तूफ़ानों से मेरा सामना होता रहा
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. अशआर=ग़ज़ल शेर का बहुवचन, 2. अता=प्रदान अर्थात
जब धूप मेरे सर पर पड़ी तो मैं छाँव देता रहा।
(हादिसा हूँ मैं'से)
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