346. धूप तेरी याद की जब भी ढली अय हमनवा
धूप तेरी याद की जब भी ढली अय हमनवा
तब किसी साये ने कर ली ख़ुदकुशी अय हमनवा
शोर है सारे नगर में बस इसी इक बात का
दुश्मनों से कर ली हमने दोस्ती अय हमनवा
मैंने तो कुछ भी नहीं उससे कहा ईमान से
बात ये बेबात में ही चल पड़ी अय हमनवा
कौन जाने कल इसे बतला गया क्या आईना
ख़ुद-ब-ख़ुद शरमा गई ये ज़िन्दगी अय हमनवा
छोड़कर साहिल को 'माँझी' दूर सागर में गया
जब कभी लहरों पे ये कश्ती चली अय हमनवा
-देवेन्द्र माँझी
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