368. मुझको जब मुश्किल में जीना आ गया
मुझको जब मुश्किल में जीना आ गया
दुश्मनों को भी पसीना आ गया
अब न ढूँढेंगे रफूगर शहर में
ऐ मुहब्बत चाक सीना आ गया
साक़िया ये सागरो-मीना उठा
मुझको पीने का क़रीना आ गया
मुझको तो इक बूँद पानी है गरां
तुझको कैसे ज़हर पीना आ गया
आँख ही उस वक़्त 'माँझी' की खुली
जब किनारे पर सफ़ीना आ गया
--देवेन्द्र माँझी
(हादिसा हूँ मैं' से)
वाहहह... मत्ला बहुत अच्छा हुआ है
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