Wednesday, November 16, 2016

368. मुझको जब मुश्किल में जीना आ गया 


मुझको जब मुश्किल में जीना आ गया
दुश्मनों को भी पसीना आ गया

अब न ढूँढेंगे रफूगर शहर में
ऐ मुहब्बत चाक सीना आ गया

साक़िया ये सागरो-मीना उठा
मुझको पीने का क़रीना आ गया

मुझको तो इक बूँद पानी है गरां
तुझको कैसे ज़हर पीना आ गया

आँख ही उस वक़्त 'माँझी' की खुली
जब किनारे पर सफ़ीना आ गया
                       --देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

1 comment:

  1. वाहहह... मत्ला बहुत अच्छा हुआ है

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