Monday, August 29, 2016

358. इतना घोर अँधेरा क्यों है 


इतना घोर अँधेरा क्यों है
उजड़ा दिन का डेरा क्यों है

डर लगता है सन्नाटों में
तन्हाई का फेरा क्यों है

साँप बसे हैं आस्तीन में
व्याकुल आज सपेरा क्यों है

जिसने लूटी बस्ती सारी
मुझमें वही लुटेरा क्यों है

काट न पाए  'माँझी ' जिसको
लहरों का वो घेरा क्यों है
                 ---देवेन्द्र माँझी

('हादिसा हूँ मैं ' से)

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