Thursday, September 1, 2016

361.  कहीं यादें, कहीं शिकवे-शिकायत और गिले होंगे 


कहीं यादें, कहीं शिकवे-शिकायत और गिले होंगे
जो पीछे छोड़ जाएँगे वो लम्बे सिलसिले होंगे

यहाँ बस्ती पै मँडराती हैं अक्सर ख़ौफ़ की बिजली
जहाँ जाकर छुपेंगे हम वो साज़िश के क़िले होंगे

भला क्यों आनकर बैठें वो बनफूलों की पाँतों में
वो कुछ तो ख़ास होंगे ही जो गमलों में खिले होंगे

यहाँ जो गर्द की सूरत नई अफ़वाह-सी उड़ती है
यहाँ से जो भी गुज़रेंगे वो किसके क़ाफ़िले होंगे

वहाँ जाकर ही टकराएगी 'माँझी ' सोच की कश्ती
जहाँ धरती-गगन आपस में दोनों ही मिले होंगे
                                        --देवेन्द्र माँझी

('हादिसा हूँ मैं' से )

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