252. जिसने अपना रूप निहारा शीशे में
जिसने अपना रूप निहारा शीशे में
उसने मेरा नाम पुकारा शीशे में
कल मुझसे ही तो मिलकर वो खोया था
फिरता था जो इक आवारा शीशे में
दुनिया जिसका जश्न मनाती है यारो
रोता है क़िस्मत का मारा शीशे में
मैंने कितनी दहलीज़ों पर पाँव रखे
छाया है जबसे अँधियारा शीशे में
इसने तो प्रतिरूप उतारा तेरा ही
झुँझलाकर क्यों पत्थर मारा शीशे में
'माँझी' उलझन में उलझा है देखो तो
ढूँढ़े है तट का नज़्ज़ारा शीशे में
-देवेन्द्र माँझी
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