Sunday, November 22, 2015

256. चली है कौन-सी देखो हवा है 


चली है कौन-सी देखो हवा है
बढ़ा जो दिल का दिल से फ़ासिला है

हमारे साथ ये भी हादिसा है
सभी को चाल पहले-से पता है

हमारे घर का वो ही रास्ता है
जहाँ मौसम भी पानी माँगता है

जिसे सुनकर सभी आँखें हैं झुलसीं
वही ये तब्सिरा हालात का है

किसी के काम शायद आ ही जाए
यहाँ पानी पे इक तिनका पड़ा है

चलो छोड़ो भी इन लहरों को 'माँझी'
समन्दर चीख़ कर अब रो पड़ा है
                            -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

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