243. सबको चक्कर में डालकर निकला
सबको चक्कर में डालकर निकला
ऐसा फ़िकरा उछाल कर निकला
खा गया ठोकरें ज़माने की
ख़ाक वो देख-भालकर निकला
किसको दीखा वो भोर का तारा
जब वो सूरज निकालकर निकला
दिल की कालिख छुपा नहीं पाया
लाख ख़ुदको उजालकर निकला
कुछ न आया था हाथ 'माँझी' के
जब वो दरिया खंगालकर निकला
-देवेन्द्र माँझी
('मजबूरियाँ मेरी' से)
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