Friday, October 30, 2015

243. सबको चक्कर में डालकर निकला 


सबको चक्कर में डालकर निकला
ऐसा फ़िकरा उछाल कर निकला

खा गया ठोकरें ज़माने की
ख़ाक वो देख-भालकर निकला

किसको दीखा वो भोर का तारा
जब वो सूरज निकालकर निकला

दिल की कालिख छुपा नहीं पाया
लाख ख़ुदको उजालकर निकला

कुछ न आया था हाथ 'माँझी' के
जब वो दरिया खंगालकर निकला
                             -देवेन्द्र माँझी

('मजबूरियाँ मेरी' से)

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