222. दर्दे-फ़ुर्क़त ग़मे-हस्ती का कँवल महका है
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दर्दे-फ़ुर्क़त ग़मे-हस्ती का कँवल महका है
आ भी जा तेरे लिए चाँद-महल महका है
हुस्न और इश्क़ के अशआर ढले जाते हैं
ऐ मुहब्बत तेरा अंदाज़े-ग़ज़ल महका है
बदली-बदली सी है टूटे हुए दिल की रंगत
शजर-ए-शौक़ तमन्नाओं का फल महका है
ये भी देखा है गुफाओं में जलाकर शम्मऐं
सारी दुनिया में तेरा तर्ज़े-अमल महका है
लेनेवाला है कोई वक़्त का अवतार जन्म
मौज-दर-मौज ऐ गंगा तेरा जल महका है
कौन ये रेत के दरियाओं से गुज़रा 'माँझी'
दश्त को देखकर हर संगे-जबल महका है
देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. दर्दे-फ़ुर्क़त=विरह की टीस, 2. ग़मे-हस्ती=दुःख भरा जीवन, 3. शजर-ए-शौक़=चाहत और इच्छाओं का वृक्ष, 4. तर्ज़े-अमल=काम का तरीक़ा, 5. दश्त=जंगल, 6. संगे-जबल=पहाड़ का पत्थर।
('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)
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