Friday, October 9, 2015


227.  बीत गईं सब मिलन की घड़ियाँ पल-पल फैल गया 

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बीत गईं सब मिलन की घड़ियाँ पल-पल फैल गया
धूप का गोरी आँगन-आँगन आँचल फैल गया

रात गए अब कौन आएगा सेज पे जाके सो
नींद से बोझिल इन आँखों में काजल फैल गया

ढलते-ढलते पीली पड़ गई विरह की मारी शाम
जैसे जोगी के माथे पर संदल फैल गया

घायल हो गई रुत फूलों की अग्निबाण चले
गुलशन-गुलशन पतझड़ मारा जंगल फैल गया

नीलगगन को देखनेवाले 'माँझी' तट पे चल
आस का पंछी क्या लौटेगा बादल फैल गया
                                       देवेन्द्र माँझी

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