227. बीत गईं सब मिलन की घड़ियाँ पल-पल फैल गया
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बीत गईं सब मिलन की घड़ियाँ पल-पल फैल गया
धूप का गोरी आँगन-आँगन आँचल फैल गया
रात गए अब कौन आएगा सेज पे जाके सो
नींद से बोझिल इन आँखों में काजल फैल गया
ढलते-ढलते पीली पड़ गई विरह की मारी शाम
जैसे जोगी के माथे पर संदल फैल गया
घायल हो गई रुत फूलों की अग्निबाण चले
गुलशन-गुलशन पतझड़ मारा जंगल फैल गया
नीलगगन को देखनेवाले 'माँझी' तट पे चल
आस का पंछी क्या लौटेगा बादल फैल गया
देवेन्द्र माँझी
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