Friday, October 30, 2015

242. वक़्त की इस चाल को अब मोड़ दे 


वक़्त की इस चाल को अब मोड़ दे
ख़ून पीती रूढ़ियों को तोड़ दे

आप दे देगा उड़ानों के सबूत
इस परिन्दे को खुला तू छोड़ दे

हाथ में अब आब ले सच्चाई का
झूठ की गगरी को अब तू फोड़ दे

लोग पढ़ लेंगे तुझे इतिहास में
इक नया अध्याय इसमें जोड़ दे

हर कोई कहता मिला 'माँझी' से ये
इस नदी के पार मुझको छोड़ दे
                          -देवेन्द्र माँझी

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