225. हाथ थामा है तो फिर हाथ झटकने से रहे
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हाथ थामा है तो फिर हाथ झटकने से रहे
अब कभी दश्ते-तमन्ना में भटकने से रहे
वादी-ए-इश्क़ में क़ाबू में रखेंगे दिल को
फिर किसी चाह में हम उलटे लटकने से रहे
उनको इक बार सदा दे-के गुज़र जाते हैं
सर को हम संगे-दरे-नाज़ पटकने से रहे
जिनको बनना था चमन बादे-ख़िज़ाँ तेरे तुफ़ैल
अब बियाबानों में वो गुंचे चटकने से रहे
टूटकर तारे ख़लाओं में ही खो जाते हैं
गिर भी जाएँ तो दरख़्तों में अटकने से रहे
लाख वो प्यार को नफ़रत में बदल देते हैं
ख़ार बनकर के वो आँखों में खटकने से रहे
देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. दश्ते-तमन्ना=मरुस्थल की चाहत, 2. वादी-ए-इश्क़=प्रेम की घाटी, 3. सदा =आवाज़, 4. संगे-दरे-नाज़=प्रेयसी के घर के दरवाज़े का पत्थर, 5. बादे-ख़िज़ाँ=पतझड़ की हवा, 6. तुफ़ैल =वास्ते, 7. ख़लाओं में=शून्य में।
('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)
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