Wednesday, October 7, 2015

223.   ज़मीं पे जाने मैं क्या सोचकर उतारा हूँ 

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ज़मीं पे जाने मैं क्या सोचकर उतारा हूँ 
अभी तो माथे के झूमर का इक सितारा हूँ   

मैं कितना टूटा हुआ हूँ तुझे नहीं मालूम 
तेरे बग़ैर मैं दुनिया में बेसहारा हूँ 

नसीमे-गुल मैं कई बार कह चुका तुझसे 
मुझे न छेड़ के मैं गर्दिशों का मारा हूँ 

ग़लत रहे हैं हमेशा तुम्हारे अंदाज़े 
मैं दोस्तों का नहीं दुश्मनों का प्यारा हूँ 

ज़माना है की मुझे नापसंद करता है 
ये ख़ुशनसीबी है मेरी तुझे गवारा हूँ 

लगा सका न किनारे पे कोई भी 'माँझी'
हरेक मौज ने तूफ़ान में उभारा हूँ 
                            -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. नसीमे-गुल=फूलों की सुगन्ध। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)





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