229. रुक गई जाके खुली छत पे पवन आज की रात
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रुक गई जाके खुली छत पे पवन आज की रात
किसी चन्दा को न लग जाए गहन आज की रात
लोग गलिओं से निकल आये हैं बाज़ारों में
बदला-बदला सा है अंदाज़े-कुहन आज की रात
बू-ए-गुल आई कहाँ से है ज़रा बतला दे
किसके आँगन में ये महका है चमन आज की रात
कौन याद आया है ख़्वाबों की हसीं वादी में
बढ़ गई और भी सीने में जलन आज की रात
छोड़ दे नाव ख़यालों के भँवर में 'माँझी'
वरना रह जायेगी बे-गोरो-कफ़न आज की रात
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--अंदाज़े-कुहन=पुराना ढंग, 2. बू-ए-गुल=फूल की ख़ुश्बू, 3. बे-गोरो-कफ़न= बिना क़ब्र और कफ़न।
('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)
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