Thursday, October 15, 2015

अब 'मजबूरियाँ मेरी' से..... 

--------------------------------------------------------------------------------


अब तक आप मेरे तीन ग़ज़ल-संग्रहों ('इशारे हवाओं के', 'समन्दर के दायरे' और 'क्यों सभी ख़ामोश हैं') की ग़ज़लें पढ़ रहे थे। अब प्रस्तुत हैं मेरे चौथे ग़ज़ल संग्रह 'मजबूरियाँ मेरी' की गज़लें।  यह संकलन वर्ष-1991 में 'भावना प्रकाशन, 126-पटपड़गंज, दिल्ली-110091' से प्रकाशित हुआ था और अपने पाठकों की काफ़ी वाह-वाही बटोरी थी। --देवेन्द्र माँझी
Ab 'majbooriyaa'n meri' se...

Ab tak aap mere teen ghazal-sa'ngraho'n (collections) ''ishaare hawaao'n ke'' , "samandar ke daayre" aur "kyo'n sabhi khaamosh hai'n" ki ghazale'n parh rahe the...
Ab prastut (pesh) hai'n mere chauthe (4th) ghazal sangrah "majbooriyaa'n meri" ki ghazle'n...yah sankalan (collection) varsh (saal)- 1991 me'n "Bhaavna Prakaashan, 126 - patpaRganj , Delhi -110091" se prakaashit (published) hu.aa tha aur apne paaTHako'n (parhnewaalo'n) ki kaafee waah-waahii baTorii thee...Devender Manjhi

’मजबूरियाँ मेरी’ शीर्षक ही क्यों ? 

अपनी इन ग़ज़लों  संकलन  क्या नाम दूँ --यह सवाल मुझे काफ़ी परेशान करता रहा। एक रंग,  मिज़ाज अथवा एक विषय-वस्तु  लेकर यदि इस संकलन की ग़ज़लें कही/ लिखी जातीं तो यक़ीनन इसके नामकरण में मुझको किसी विशेष परेशानी  साये से नहीं गुज़रना पड़ता मगर मेरे कवि-मन ने अपनी ग़ज़लों  मन्दिर के लिए विभिन्न विषय-वस्तुओं के पत्थरों  उठाकर अलग-अलग शे'र-रुपी देवताओं को तराशने व रंग-बिरंगे परिधानों से सजाने का प्रयास किया है।

No comments:

Post a Comment