241. इससे तो बेकारी अच्छी
इससे तो बेकारी अच्छी
हाथ कटाकर मिलती रोज़ी
बिन इसके भी काम चले ना
बेशक ये माया है ठगनी
रोम जले तो जलने भी दो
नीरो की बजती है बंसी
आज अदब की हर महफ़िल है
चौराहे की सब्ज़ी-मण्डी
किस-किसको ये पार करेगी
जर्जर होती 'माँझी' कश्ती
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. रोज़ी=आजीविका, 2. अदब=साहित्य।
('मजबूरियाँ मेरी' से)
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