Tuesday, October 6, 2015

221. अकेला मैं ही न था इस दयार में शामिल 

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अकेला मैं ही न था इस दयार में शामिल
शबे-फ़िराक़ भी थी इन्तिज़ार में शामिल

हवा के ख़ौफ़ से मैंने कफ़न जो पहना था
बिख़र के हो गया चढ़ते ग़ुबार में शामिल

मुझे मलाल नहीं तेरी बेवफ़ाई का
ख़ुलूस कम था मेरा तेरे प्यार में शामिल

वो शख़्स कौन-से ग़म में कराहता ही रहा
हुआ न जश्ने-गुले-नौबहार में शामिल

ये देखते ही वो तूफ़ान टल गया 'माँझी'
नदी की धार थी सागर की धार में शामिल
                                   -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. दयार=घर, घेर, २. शबे-फ़िराक़=विरह-रात्रि, 3. जश्ने-गुले-नौबहार=नई बहार का उत्सव।

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

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