230. ग़ुरबत हो लाख शान से रहने लगे हैं लोग
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ग़ुरबत हो लाख शान से रहने लगे हैं लोग
बस्ती में आन-बान से रहने लगे हैं लोग
निकली है लाश जबसे बरहना ग़रीब की
अब दूर उस मकान से रहने लगे हैं लोग
बाज़ार-ए-हुस्न छुपने लगा भीड़-भाड़ में
मानूस हर दूकान से रहने लगे हैं लोग
झड़ते थे फूल जब भी कोई मा’रिका हुआ
महफ़िल में बदज़बान से रहने लगे हैं लोग
जो बौने-क़द थे 'माँझी' मचानों पे चढ़ गए
धरती पे आसमान से रहने लगे हैं लोग
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. ग़ुरबत=ग़रीबी, 2. बरहना=नग्न, नंगी, 3. बाज़ार-ए-हुस्न=सौन्दर्य का बाज़ार, 4. मानूस=प्रभावित, 5. मा’रिका=वाद-विवाद, बहस।
('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)
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