Monday, December 14, 2015

272.  देखके मुझसे मेरी जंग 


देखके मुझसे मेरी जंग
दुश्मन भी रह जाते दंग

छीन लिया है मेरा चैन
और करो ना मुझको तंग

जीने को सब जीते हैं
चिड़िया, कौवा, कीट, पतंग

गिरगिट भी तौबा करते
मानव बदले इतने रंग

तूफ़ानों की फ़िक्र नहीं
'मांझी' रहता मस्त-मलंग
                    -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

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