Sunday, December 13, 2015

271. जैसे ख़ुशबू उपवन में 


जैसे ख़ुशबू उपवन में
आ जा तू आलिंगन में

दिल की आग भड़कती है
जाने क्यों इस सावन में

देख हमें क्यों मस्त यहाँ
ये दुनिया है उलझन में

दहशत ही बस दहशत है
क्यों देखूँ इस दरपन में

सात समन्दर ठहरे हैं
'माँझी' दिल के आँगन में
                   -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

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