Monday, December 21, 2015

278.  किसलिए वृक्षो! सलाम पतझड़ में 


किसलिए वृक्षो! सलाम पतझड़ में
कर गए पत्ते तमाम पतझड़ में

धूप आकर बारहा इस छाँव से
ले रही है इन्तिक़ाम पतझड़ में

आँधियाँ हैं, गर्द ही तो लाएँगी
रात हो या सुबहो-शाम पतझड़ में

आईनों की क़द्र घटती ही गई
आ गया कैसा मुकाम पतझड़ में

ज़िन्दगी की नाव 'माँझी' किसलिए
कर चला लहरों के नाम पतझड़ में
                                 -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

No comments:

Post a Comment