268. राज़ जब सच्चाई का सब खुल गया
राज़ जब सच्चाई का सब खुल गया
क्यों नगर ये हो बहुत व्याकुल गया
पत्थरों को देखकर भी हाथ में
आईना दिखलाने पर वो तुल गया
तितलिओं की बात जब उसने सुनी
बोझ-सा मन पर लिये इक गुल गया
जब बनीं तो बन गईं पुश्तें कई
जब गया तो सारे कुल का कुल गया
देख 'माँझी' आज दामन ख़ुद-ब-ख़ुद
आँख से अश्कों को लेकर धुल गया
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. गुल=फूल, पुष्प, २. अश्क=आँसू।
(मजबूरियाँ मेरी' से)
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